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अलविदा रजनी तिलक : दिल्ली में निगम बोध घाट पर बौद्ध परंपरा के अनुसार हुआ अंतिम संस्कार

हिन्दी साहित्य की प्रसिद्ध लेखिका, कवियत्री और अंबेडकरवादी, नारी-मुक्ति आंदोलन की अग्रणी नेता रजनी तिलक को शनिवार (31 मार्च) को पंचशील के झंडे में नम आंखों से अंतिम विदाई दी गई।  दिल्ली स्थित निगम बोध घाट पर विद्युत शव दाह गृह में बौद्ध धर्म की परंपरा के अनुसार उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार कर दिया गया। इस दौरान निगम बोध घाट रजनी तिलक अमर रहे के नारे लगाए जा रहे थे।



इस मौके पर हिन्दी दलित साहित्य जगत, पत्रकारिता, राजनीतिक और समाज सेवा के क्षेत्र और की तमाम बड़ी हस्तियों ने निगम बोध घाट पर  पहुंच कर रजनी तिलक के अंतिम दर्शन किए और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। इनमें प्रमुख रूप से रजनी तिलक की एक मात्र बेटी ज्योति, उनके छोटे भाई और प्रसिद्ध समाज सेवी अशोक भारती, उनकी छोटी बहन  लेखिका अनिता भारती के अलावा माकपा की पूर्व सांसद वृंदा करात, सुभाषिनी अली, आरजेडी के राज्यसभा सांसद मनोज झा, प्रसिद्ध साहित्यकार डॉक्टर जय प्रकाश कर्दम, डॉक्टर श्योराज सिंह बेचैन, मोहनदास नैमिशराय, कुसुम वियोगी, कर्मशील भारती, डॉ. रजत रानी मीनू, समाज सेवी बेजवाडा विल्सन, के पी चौधरी, बी एस भारती, ज्यां द्रेज, बजरंग बिहारी, शबनम हाशमी, हेमलता महेश्वर, रजनी अनुरागी, अंजलि देशपांडे, पुनम ताषमड, मुकेश मानस, पुनम तुषामड समेत कई गणमान्य लोग मौजूद रहे। रजनी तिलक के असामयिक निधन पर जनवादी लेखक संघ, दलित लेखिका संघ समेत कई संगठनों ने गहरा शोक जताया है।


आपको बता दें कि प्रसिद्ध लेखिका और दलितों, महिलाओं की सशक्त आवाज रजनी तिलक का 30 मार्च को रात 11 बजे दिल्ली के सेंट स्टीफंस अस्पताल में निधन हो गया था। उन्हें रीढ़ में बीमारी के कारण पिछले दिनों अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उन्हें वेंटीलेटर पर रखा गया था। वो करीब 60 साल की थी।



रजनी तिलक हमेशा अपने लेखन के जरिये महिलाओं की आवाज़ को बुलंद करने की दिशा में कार्य करती रहीं। अपनी इसी मुखरता के कारण उन्होंने ना सिर्फ साहित्य बल्कि आमजन के बीच भी एक खास पहचान बनाई। रजनी तिलक का जन्म 27 मई 1958 को पुरानी दिल्ली में जामा मस्जिद के पास कटरा राजाराम मोहल्ले में जाटव समाज के मास्टर (दर्जी) दुलारे लाल और जावित्री देवी के घर में हुआ हुआ था। लेखन और समाज सेवा का उन पर जुनून सवार था, इसीलिए उन्होंने प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) की नौकरी छोड़ दी थी। उन्होंने साहित्य का क्षेत्र हो या जनीतिक,सामाजिक संगठनों का मंच, वो लगातार महिला हिस्सेदारी की आवाज़ पुरजोर तरीके से उठाती रहीं। रजनी तिलक अपने छात्र जीवन में ही दलित आन्दोलन, स्त्री मुक्ति आन्दोलन के साथ शामिल हो गई थीं। उन्होंने सहेली के साथ मिल कर महिलाओ के विरुद्ध भेदभाव  के खिलाफ संघर्ष किया था और आंगनवाडी कार्यकर्त्ता के साथ मिलकर अखिल भारतीय आंगनवाड़ी यूनियन संगठन बनाया था। इसके साथ ही वो  दलित लेखक संघ, सेंटर फॉर ऑल्टरनेटिव दलित मीडिया (कदम) अध्यक्ष भी रहीं थीं। रजनी तिलक बामसेफ, दलित पेंथर, आह्वान थियेटर (दलित थियेटर),  नेशनल फेडरेशन दलित वीमेन, नैक्डोर, वर्ल्ड डिग्निटी फोरम और राष्ट्रीय दलित महिला आन्दोलन समेत अनेक संगठनों में अपनी सेवाएं देती रहीं। उनके सामाजिक कार्यों को देखते हुए राष्ट्रीय महिला आयोग ने उन्हें 2 बार अनुसूचित जाति की एक्सपर्ट कमेटी के सदस्य के रूप में मनोनीत किया और आउटस्टैंडिंग वीमेन अचीवर अवार्ड से भी सम्मानित किया था।



रजनी तिलक ने समाज सेवा के साथ-साथ साहित्यिक और पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अपना बहुमूल्य योगदान दिया। उन्होंने  अभिमूक नायक समाचार पत्र का सम्पादन किया। उनकी आत्मकथा ‘अपनी जमीं,अपना आसमां’ काफी चर्चित हुई थी। उन्होंने ‘पदचाप’, ‘हवा सी बेचैन युवतियां’, ‘अनकही कहानियां’ जैसे कविता-संग्रह काव्य संग्रह और ‘बुद्ध ने घर 0क्यों छोड़ा’, ‘डॉ.अंबेडकर और महिलाएं’, ‘दलित मुक्ति नायिकाएं’, ‘सावित्री माई फुले’ समते कई अन्य किताबों की रचना की थी।  



रजनी तिलक के असामयिक निधन से हिन्दी दलित साहित्य आंदोलन के एक युग का अंत हो गया है। ये स्त्री-मुक्ति आंदोलन, साहित्यिक, पत्रकारिता और समाज सेवा के क्षेत्र के लिए बहुत बड़ी क्षति है। न्यूज़ पोर्टल ‘पड़ताल’ परिवार रजनी तिलक जी के निधन पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उन्हें कोटि-कोटि नमन करता है। साथ ही उनके परिवार के सदस्यों को इस दुख की घड़ी में संबल प्रदान करने की आशा करता करता है। हम सभी को रजनी तिलक जी के संघर्षमयी जीवन, कार्यों और लेखन से हमेशा प्रेरणा मिलती रहेगी।


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1 Comments

  •  
    Rekha Rani T.J
    2018-04-02

    अश्रुपूर्ण विदाई रजनी दी आपका यूं अचानक ही चले जाना यकीन ही नहीं हो रहा है ।हिंदी दलित स्त्री अस्मिता की एक पहचान थीआप ।जिसे आने वाले दिनों में कई सालों तक भरा नहीं जा सकता ।आपकी कर्मठता, मेहनत ,लगन, साहित्य देन को हिंदी दलित साहित्य कभी नहीं भुला पायेगा ।

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