img

त्वरित टिप्पणी : संविधान और भी बहुत कुछ कहता है

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के नाम में परिवर्तन करने का निर्णय चौकाने वाला है। यदि कोई नाम गलत लिखा जा रहा हो, उससे राज्य में किसी प्रकार की अव्यवस्था या जनता का कोई अहित हो रहा हो तो नाम बदलने या संशोधित करने का कोई औचित्य समझ में आ सकता था। किन्तु इस प्रसंग में ऐसा कुछ भी नहीं है।  उल्लेखनीय यह भी है कि राज्य सरकार के दस्तावेजों में डॉ. अंबेडकर के नाम को परिवर्तित करके लिखने की मांग भी अंबेडकरवादी समाज द्वारा नहीं की गई है। फिर राज्य सरकार को डॉ. अंबेडकर के नाम को संशोधित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी।

उत्तर प्रदेश सरकार का यह कदम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद या कहिए हिन्दू साम्राज्यवाद की स्थापना की दिशा में एक प्रयास है और इसे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघ चालक मोहन भागवत के उस कथन की पृष्ठभूमि में देखा और समझा जा सकता है जिसमें उन्होंने कहा था कि हिंदुस्तान में रहने वाला प्रत्येक नागरिक हिन्दू है। अपने इस तर्क के आधार पर उन्होंने भारत में रहने वाले मुस्लिमों को भी हिन्दू कहा था। 

डॉ. अंबेडकर के नाम परिवर्तन के पीछे तर्क दिया जा रहा है कि भारतीय संविधान की मूल प्रति पर बाबा साहब डॉ. अंबेडकर ने अपने जिस नाम से हस्ताक्षर किए हैं वही उनका सही नाम है,और उसका इस्तेमाल ही किया जाना चाहिए| यदि इस तर्क को सही माना जाता है तो  संविधान और भी बहुत कुछ कहता है| संविधान में राष्ट्र का नाम ‘भारत’ है| संविधान में कहीं  पर भी ‘भारत’ के लिए ‘हिंदुस्तान’ शब्द नहीं लिखा गया है। संविधान के अनुच्छेद 1.1 के अनुसार राष्ट्र का नाम ‘इण्डिया अर्थात भारत’ है।  संविधान के प्रति उत्तर प्रदेश की सरकार की यदि इतनी ही गहरी निष्ठा है और इतिहास की विसंगतियों को दूर करने की उसकी इतनी ही चिंता है तो उसे सबसे पहले राज्य सरकार के सभी दस्तावेजों में राष्ट्र के लिए हिंदुस्तान शब्द के प्रयोग को प्रतिबंधित करते हुए संविधान द्वारा निर्देशित भारत शब्द का प्रयोग करना  अनिवार्य किया जाना चाहिए। इसी तरह राष्ट्र के गौरव और गरिमा के लिए जय हिन्द का नारा लगाना बंद कर जय भारत का नारा लगाना अनिवार्य किया जाना चाहिए। सभी मंत्रियों, विधायकों आदि के लिए भी सार्वजनिक मंचों से हिंदुस्तान नहीं भारत शब्द का प्रयोग किया जाना बाध्यकारी हो। उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार को डॉ. अंबेडकर के नाम में परिवर्तन करने से पहले संविधान का सम्मान करते हुए ये प्रावधान किए जाने चाहिए। डॉ. अंबेडकर ने संविधान में और संविधान से बाहर भी बहुत कुछ कहा है, जो दस्तावेजों में मौजूद है। उस पर अमल करने के प्रति कितनी गंभीरता है? सवाल है कि इस प्रकार की मुहिम से उत्तर प्रदेश सरकार डॉ. अंबेडकर का सम्मान करना चाहती है या उनकी विरासत को ध्वस्त करना चाहती है?
 
डॉ. अंबेडकर का नाम परिवर्तित करने का आदेश जारी करने वाली सरकार को यह भी देखना चाहिए कि हम एक राष्ट्र के नागरिक हैं, किसी देश के नहीं| संविधान राष्ट्र को परिभाषित करता है, देश को नहीं| इसलिए भारतीय संविधान की मर्यादा का पालन करते हुए देश-भक्ति, देश-प्रेम जैसे शब्दों को भी प्रतिबंधित कर उनके स्थान पर राष्ट्र-भक्ति, राष्ट्र-निष्ठा, राष्ट्र-प्रेम आदि शब्दों का प्रयोग सुनिश्चित कराया जाए।  यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो डॉ. अंबेडकर के नाम परिवर्तन का यह आदेश डॉ. अंबेडकर को हिन्दू बनाने अथवा हिन्दू के रूप में प्रचारित कर दलितों को हिन्दुत्व से जोड़ने या जोड़े रखने की मुहिम के अलावा कोई अन्य निहितार्थ नहीं देगा।  यह केवल भारत को खत्म करके हिंदुस्तान को स्थापित करने की सुनियोजित कार्रवाई मात्र नहीं है, अपितु, अंबेडकर की पहचान को खण्डित करने, अंबेडकरवाद को ध्वस्त करने और अंबेडकर के अनुयायी समाज को राम के साथ जोड़कर बुद्ध के वैज्ञानिक चिंतन से दूर ले जाने की भी कोशिश है। भारतीय समाज इस तरह की एकांगी और अंबेडकरवाद दलित विरोधी किसी भी कार्रवाई को कभी स्वीकार नहीं करेगा।  
लेखक- डॉ. जय प्रकाश कर्दम


' पड़ताल ' से जुड़ने के लिए धन्यवाद अगर आपको यह रिपोर्ट पसंद आई हो तो कृपया इसे शेयर करें और सबस्क्राइब करें। हम एक गैर-लाभकारी संगठन हैं। हमारी पत्रकारिता को सरकार और कॉरपोरेट दबाव से मुक्त रखने के लिए आर्थिक मदद करें।

संबंधित खबरें

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked with *

0 Comments

मुख्य ख़बरें

मुख्य पड़ताल

विज्ञापन

संपादकीय

वीडियो

Subscribe Newsletter

फेसबुक पर हमसे से जुड़े