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लोकपाल बम फिस्स हुआ तो आरक्षण के विरोध पर उतरे अन्ना

इससे पहले कि अनुसूचित/अनुसूचित जन जातियों को संविधान के तहत प्राप्त आरक्षण के प्रावधान पर कुछ और बात की जाए, यह समझना अति आवश्यक है कि आखिर आरक्षण है क्या? इसके बाद ही आरक्षण की मूल धारणा को समझा जा सकता है। इस बारे में अलग-अलग लोगों के अलग-अलग मत हैं। लेकिन आरक्षण पेट भरने का साधन कतई नहीं है, इसका जो मूल अर्थ है वह है दबी-कुचली जातियों का व्यवस्था में प्रतिनिधित्व।  

विदित हो कि सन 1932 में जब गोलमेज सम्मलेन में इस बात पर सहमति बनी कि आरक्षण होना चाहिए। इस सम्मेलन में यह भी तय किया गया कि समाज में जिन जातियां  के लोग सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से समाज की मुख्य धारा से वंचित रह गए हैं। उनकी सूची तैयार की जाय और उस सूची के आधार पर समाज में इन लोगो की बेहतरी के  लिए कुछ प्रावधान रखा जाय ताकि इनको समाज की मुख्य धारा में शामिल किया जा सके।  बाद में इसी को आधार बनाकर संविधान में आरक्षण का प्रावधान रखा गया और इस सूची को संविधान में अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जनजाति नाम दिया गया। बाद में अनुच्छेद 16(4) के तहत एक इसी सूची को अत्यंत पिछड़ा वर्ग का नाम दिया गया। इसके तहत संविधान के अनुच्छेद 330 में  राजनितिक आरक्षण का प्रावधान तो अनुच्छेद 335 में इस जातियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था की गई।

उल्लेखनीय है कि समय-समय पर अलग-अलग लोगों द्वारा इन दोनों प्रकार के आरक्षण की समय सीमा को लेकर अलग-अलग विचारों के तहत विवाद खड़ा किया जाता रहा है। सबसे बड़ा विवाद सरकारी नौकरियों में आरक्षण की समय-सीमा को लेकर खड़ा किया जाता है। इस संबन्ध में संविधान विशेषज्ञ रतनलाल केन से संपर्क साधने पर उन्होंने बताया कि आम जनता को ही नहीं, राजनीति के तथाकथित मठाधीश भी सरकारी नौकरियों में आरक्षण की समय-सीमा को लेकर गलत बयानी करते रहते हैं। रतनलाल जी ने उदाहरण के रूप में ‘आज तक’ टी वी चैनल पर एंकर पुण्य प्रसून वाजपेयी द्वारा 09.10.2017 प्रस्तुत कार्यक्रम का हवाला दिया जिसमें उन्होंने एस सी/एस टी को नौकारियों में आरक्षण की समय सीमा को केवल दस वर्ष करार दिया, जो न केवल भ्रामक है, अपितु एंकर पुण्य प्रसून वाजपेयी के ज्ञान की पोल खोलता है। रतनलाल जी द्वारा यह मसला ‘आज तक’ के प्रबन्धकों के सामने लिखित में रखा गया तो ‘आज तक’ के प्रबंधन ने आश्वासन दिया कि भविष्य इस प्रकार की बारीकियों पर ध्यान रखा जाएगा।

‘आज तक’ टी वी चैनल पर पुण्य प्रसून वाजपेयी के इस बयान के बाद ‘आज तक’ की ही एक और एंकर अंजना ओम कश्यप ने गुजरात के हार्दिक पटेल, जिग्नेश और अल्पेश के साथ (13.10.2017) एक साक्षात्कार में बिना किसी संदर्भ के हार्दिक पटेल से राजशाही तेवर में सवाल किया कि डॉ. बी आर अम्बेडकर चाहते थे कि नौकरियों आरक्षण धीरे-धीरे समाप्त कर दिया जाना चाहिए। जिसे हार्दिक ने नकारा तो सही किंतु अंजना अपनी अज्ञानता का बार-बार परिचय देती रहीं। इस संदर्भ में मेरा मत है कि पाठकों को सच्चाई को ठीक से जान लेना चाहिए। मैं जानता हूँ कि बाबा साहेब डा. अम्बेडकर ने कभी भी नौकरियों में आरक्षण को समाप्त करने की बात नहीं कही। हाँ दलित शब्द को देर तक न ढोने का समर्थन जरूर किया था। 

रतनलाल जी आगे बताते हैं कि आम जनता को ही इस विवाद में दोषी नहीं माना जा सकता। हद तो तब हो गई जब देश के प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने 15.08.2002 के भाषण में यह जोड़ दिया कि मैं एस सी/ एस टी के युवाओं को सरकारी नौकरियों में आरक्षण की अवधि को और दस सालों के लिए बढ़ाने का एलान करता हूँ। रतनलाल जी कहते हैं कि जब देश के सैंवाधानिक पदों पर बैठे लोगों को ही इन प्रावधानों के विषय में सही से जानकारी नहीं है (या फिर वे जान-पूछकर तथ्यों को भूलने का नाटक करके इस जातियों के लोगों पर डोरे डालने का काम करते हैं) तो आम जनता को क्या कहा जाए, जो सुनी-सुनाई बातों को आधार मानकर ही विवादों में फंस जाती है।

दरअसल सच्चाई ये है कि संविधान के अनुच्छेद 334 के तहत राजनीतिक आरक्षण को प्राथमिक स्तर पर केवल (दस) 10 वर्षों के लिए लागू किया गया था। सामाजिक यानी सरकारी नौकरियों में आरक्षण इस राजनीतिक आरक्षण की अवधारणा के विपरीत थी/है। इसकी मूल अवधारणा यह थी कि जब तक समाज के उपेक्षित लोग समाज के दूसरे लोगो के बराबर खड़े नहीं हो जाते हैं, तब तक सरकारी नौकरियों में आरक्षण लागू रहेगा। सरकारी नौकरियों में आरक्षण का मूल मंत्र यही था। यही एक कारण है कि संविधान के अनुच्छेद 335 में सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लिए कोई समय-सीमा तय नहीं है। और राजनीतिक मठाधीश राजनीति में आरक्षण की तय समय-सीमा को सरकारी नौकरियों में आरक्षण की अवधि मानकर बयानबाजी करते रहते हैं।

अब सवाल ये उठता है कि आज के भारत की रुग्ण राजनीति समाज की अ. ज./अ. ज. जातियों को सरकारी नौकरियों को प्रदत्त आरक्षण पर तो समय-सीमा को लेकर बवाल मचाती रहती है किंतु राजनितिक आरक्षण की समय-सीमा पर कोई सवाल नहीं उठाती क्योंकि राजनीति में आरक्षण से दबंग राजनीतिक दलों को लाभ मिलता है। तभी तो राजनीतिक आरक्षण की समय-सीमा को हर दस साल में बढ़ा दिया जाता है। अक्सर यह भी देखा गया है कि आरक्षित सीटों से जीतकर आने वाले ज्यादातर दलित नेता दलितों के हक की बात न करके अपने आका नेताओं की चरण-वन्दना में ही लगे रहते हैं। मेरी समझ में ये नहीं आ रहा कि आरक्षित सीटों से जीतकर आने वाले दलित नेताओं का अपने वर्ग को ही यदि कोई लाभ नहीं मिलता तो राजनीति में आरक्षण का औचित्य क्या है?
    
मैं समझता हूँ कि देश की उन आबादियों को जो आरक्षण पर विवाद खड़ा करने से बाज नहीं आतीं, उन्हें ये जान लेना चाहिए कि हमारे देश की सरकार चाहे किसी भी दल की रही हो... कभी भी अनुसूचित/अनुसूचित जन जातियों और अब ओबीसी की पक्षधर नहीं रहीं। यदि ऐसा होता तो संविधान के अनुच्छेद 16(4) जिसमें सरकार को आरक्षण के नियमन के लिए कानून बनाने का अधिकार दिया गया है, कानून बन गया होता किंतु ऐसा आज तक भी ऐसा नहीं हुआ है। केवल और केवल अनुसूचित/अनुसूचित जन जातियों और अब ओबीसी  के प्रति दया का भाव दिखाने का काम किया जाता है... और कुछ नहीं। कम से कम अब जबकि पिछड़े वर्ग का प्रधानमंत्री है तो आरक्षण को लागू करने के लिए एक कानूनी एक्ट तो बना दिया जाना ही चाहिए। किंतु ऐसा होने वाला नहीं है?

आज की तारीख में भी कोई कहता है कि आरक्षण होना चाहिए, कोई कहता है कि नहीं होना चाहिए। कोई कहता है, यह संविधान की मूल अवधारणा के खिलाफ है। कोई कहता है जो बाबा साहेब लिख कर गए आरक्षण के बारे में उसके खिलाफ है। यदि मैं ये कहूं कि ये वे अज्ञानी लोग हैं जो सामाजिक तो हैं नहीं, अज्ञानी भी हैं।

आरएसएस के मोहन भागवत के बाद, अब समाज-सेवी ‘अन्ना’ भी नौकरियों में आरक्षण के विरोध में कूद पड़े हैं। कुछ दिन पहले वो मोदी के विरोध में भी उतरे थे... शायद वहाँ से कुछ खुराक मिल गई होगी सो मोदी जी को छोड़कर आरक्षण के विरोध में उतर आए। कहते हैं कि आरक्षण के चलते भारतीय समाज टूट जाएगा। अब अन्य जातियां भी आरक्षण मांगने लग गई हैं.... ऐसे में देश टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा। अब अन्ना जी से कोई ये पूछे कि आरक्षण लागू होने से पूर्व भारत कौन सा एक था। भारत जातियों में नहीं अपितु भारत रजवाड़ों में बंटा हुआ था। सच तो ये लगता है कि अन्ना के लोकपाल की नियुक्ति के प्रस्ताव को तो  भाजपा निगल गई। अब क्या करें अन्ना? अन्ना का लोकपाल बम फिस्स क्या हुआ, कि आरक्षण के विरोध में गोली चलाने लग गए। उन्होंने कुछ लोगों को खुश करने के लिए आरक्षण पर तीर चला दिया। बुरा न मानें, चर्चा में बने रहने वालों को तार्किक अथवा अतार्किक कोई तो मुद्दा चाहिए ही होता है कि नहीं? अन्ना जी इस खोज में सच मे परिपक्व हैं। यह तो मानना ही पड़ेगा। उन्हें मुद्दा मिल गया कि समाज के अलग-अलग वर्ग आरक्षण की मांग करने लग गए हैं। यथा देश में आरक्षण (रिजर्वेशन) का मुद्दा सालों से चला आ रहा है। आजादी से पहले ही नौकरियों और शिक्षा में पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण देने की शुरुआत कर दी गई थी। इसके लिए अलग-अगल राज्यों में विशेष आरक्षण के लिए आंदोलन होते रहे हैं। राजस्थान में गुर्जर, हरियाणा में जाट और गुजरात में पाटीदारों (पटेल) ने आरक्षण की मांग उठाई है। मेरा अन्ना जी से अनुरोध है कि भूखे रहकर इस मांग को लेकर भी एक आन्दोलन करें कि भारत देश में अब “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी” के आधार पर तमाम जातियों को संख्या के आधार पर, तमाम क्षेत्रों में आरक्षण प्रदान कर देना चाहिए। ऐसे हो जाने से आरक्षण का विवाद हमेशा के लिए ही समाप्त हो जाएगा। पर अन्ना ऐसा करने वाले नहीं हैं।
   
संविधान में आरक्षण का प्रावधान होना चाहिए। इस बात के पीछे कुछ ना कुछ तो सत्यता रही होगी, कोई इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता है। आरक्षण होना चाहिए या नहीं, यह एक अलग मुद्दा है। लेकिन आम लोगों की राय हमेशा से जातिगत आरक्षण के आसपास सिमट कर रह जाती है। मूल बात जो है वो ये है कि आरक्षण के बारे में लोग बात तो करना चाहते हैं, लेकिन इसे व्यापक स्तर पर बहस का मुद्दा नहीं बनाना चाहते।  क्योंकि उनके लिए आरक्षण का मुख्य मुद्दा हमेशा जातिगत आरक्षण के साथ चिपका हुआ है। ऐसा क्यों है?  ऐसा इसीलिए है क्योंकि वे आरक्षण की मूल अवधारणा जो बाबा साहेब ने संविधान में रखी थी, उससे भली भाँति अवगत नहीं हैं। सबसे पहले आप आरक्षण के बारे में समझें कि अनेक विरोध होने के वावजूद बाबा साहेब ने यह प्रावधान संविधान में रखा था। असल में दिक्कत यह है की लोग एक सन्दर्भ को दूसरे सन्दर्भ के साथ जोड़कर देखते हैं। जबकि एक सन्दर्भ हमेशा दूसरे सन्दर्भ से अलग होता है। लोग सामाजिक आरक्षण को जातिगत आरक्षण का नाम देकर एक दूसरे को दिग्भ्रमित करने की कोशिश करते हैं, जबकि जातिगत आरक्षण नामक कोई शब्द ही नही है संविधान में। यह एक सामाजिक आरक्षण है ना की जातिगत आरक्षण। अब सवाल उठता है, आखिर दोनों में अंतर क्या है। ये मान भी लिया जाए कि यह जाति आधारित आरक्षण है, तो संविधान क्या कहता है इसके बारे में। संविधान इसे सामाजिक आरक्षण कहता है, ना कि जातिगत आरक्षण। संविधान के अनुसार सामाजिक आरक्षण का मतलब होता है, समाज में सामाजिक एकरूपता, आर्थिक एकरूपता और शैक्षणिक एकरूपता।

यहाँ इस बात का उल्लेख करना भी मुझे अतार्किक नहीं लगता कि जब आरक्षण के प्रावधान को डा. अम्बेडकर संविधान में शामिल करना चाह रहे थे तो उस समय के गैर-दलित नेता सरदार पटेल इसके विरोध में डा. अम्बेडकर से मिले और संविधान में आरक्षण के प्रावधान  के प्रति अपना विरोध जताया। तब चाय की टेबल पर पटेल जी की बात का विरोध करते हुए अम्बेडकर ने सरदार पटेल को संविधान निर्माता समिति से अपना त्यागपत्र थमा दिया और  कहा कि संविधान निर्माण समिति में मेरे होते हुए यह नहीं हो सकता, तो सरदार पटेल ने यह कहकर कि अम्बेडकर मैं जिद्दी जरूर हूँ, किंतु पागल नहीं हूँ...... डॉ. अम्बेडकर का त्याग-पत्र फाड़कर फैंक दिया। फिर ये आज के कुछ सामाजिक नेता किस आधार पर आरक्षण का विरोध करने पर उतारू हैं।

आरक्षण के विरोधी तब कहां चले जाते हैं... जब लोग उनके घर का कूड़ा उठाते हैं?  वो  इसका विरोध तब क्यों भूल जाते हैं, जब झाड़ू लगाना होता है? आरक्षण का विरोध तब क्यों नहीं होता, जब शादी की बात आती है? आरक्षण का विरोध तब क्यों नहीं किया जाता है, जब दलितों के नाम पर लोगों को मंदिरों में प्रवेश को प्रतिबंधित किया जाता है? ऐसे अनेक प्रश्न हैं जो आरक्षण विरोधियों से किए जा सकते हैं। सबसे बड़ा सवाल आज भी जिन्दा है कि देश को आजाद हुए 70 वर्ष हो गए हैं किंतु समाज का ये हिस्सा आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है। तो क्या ऐसे में सामाजिक न्याय की बात करना बेमानी नहीं होगी?
(ये लेखक के निजी विचार हैं)  
      
लेखक:  तेजपाल सिंह तेज (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की दर्जन-भर किताबें प्रकाशित हैं- दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से आदि ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि, पुश्तैनी पीड़ा आदि (कविता संग्रह), रुन-झुन, खेल-खेल में आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), दो निबन्ध संग्रह  और अन्य। तेजपाल सिंह ‘तेज’  साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक, आजीवक विजन के प्रधान सम्पादक तथा अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर इन दिनों आप स्वतंत्र लेखन के रत हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं।    


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2 Comments

  •  
    naresh kumar lahare
    2017-11-05

    is lekh ke liye aapko bahut bahut dhanyawad lekin ye anna hajare roji roti chalane aisa karte hai per unki baatoo ko media me tawajjo dene ki jarurat hi nahi hai mai to haathi gaye bazar our kutta bhoke hajar aisa manta hoo

  •  
    Vipin singh chauhan
    2017-10-28

    Very good sir ji

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