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भाजपा की अराजक सत्ता

बाबा साहब डॉ.अम्बेडकर ने 1 दिसम्बर 1951 को  कासव जी जंहागीर हाल-मुंबई मे अपना " कांग्रेस की आराजक सत्ता " के विषय में भाषण दिया था, जो " जनता " अखबार मे छपा था। आज जबकि केन्द्र में भाजपा की सत्ता है तो डा. अम्बेडकर द्वारा उस समय का दिया गया भाषण आज की सत्ता के संबंध में  पूरी तरह से प्रासंगिक बन पड़ा है। अर्थात यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि वर्तमान भाजपा सरकार भी कांग्रेस की तरह " भाजपा की आराजक सत्ता "  ही है । ओकानल के शब्दों में कहा जाए तो “No man can be grateful at the cost of his integrity."  अगर कोई व्यक्ति ईमानदारी को बाजू मे रखकर यदि कृतघ्न हुआ तो वह मानवीय व्यक्तित्व का वध ही है । (संदर्भ:  मैं डा.भीमराव अम्बेडकर बोल रहा हूं। भाग-4 अनुवाद एवं संपादक प्रभाकर गजभिये)

क्योंकि सत्ता की सापेक्षता मे ईमानदारी व जनहित न्याय ही महत्वपूर्ण लगता है। सरकारी राज्य कारोबार की शुध्दता ही वर्तमान सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए, यही एक मुख्य विषय है। कोई भी सरकार कितना जनहित साधती है, इसी बात पर उसकी श्रेष्टता परखी जाती है। रोजी-रोटी, कपडा-मकान का प्रश्न तो महत्वपूर्ण है ही परन्तु उससे भी महत्वपूर्ण बात राजकीय कारोबार की पारदर्शिता एंव शुध्दता से भी जुड़ी होती है। सर्वविदित है कि भारत विगत कई दशकों से विभन्न स्तरों पर संकट से गुजर रहा है। जिसमे बाह्य एंव आंतरिक आतंक सबसे खतरनाक रुप मे उभरा है, जो देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर समस्या एंव चुनौती है। शासन और प्रशासन में व्याप्त रिश्वतखोरी व आर्थिक घोटाले अव्यवस्था को और बल प्रदान करते हैं। राज्य शासन को स्वच्छ एवं पारदर्शी बनाए रखने के लिए, किसी बाहरी मदद या दखल की आवश्यकता नहीं होती है अपितु उसे स्वच्छ रखने हेतु दृढ़ इच्छाशक्ति की जरुरत होती है। नेतृत्वकर्ता की दृढ इच्छा शक्ति के बावजूद निचले पायदान पर विराजमान नेताओं के अनर्गल बयान देश के माहौल को भट्टी मे झौंकने का ही कार्य कर रहे हैं। जो अपराधी प्रवृति के लोगो को उकसा कर हिंसक बनाने मे मददगार साबित हो रहे है। ऐसे मे हिंसक होते युवा मनोविज्ञान को समाजशास्त्री,  बुद्धिजीवियों को समझने की ही जरुरत नहीं, बल्कि राजनेताओं को भी विचार करने की जरूरत है। पक्ष-विपक्ष द्वारा एक दूसरे पर व्यक्तिगत टीका टिप्पणी/आरोप-प्रत्यारोप का चलन लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है।

नेताओं और पूंजीपतियों का गठजोड़ हर क्षेत्र में अपना दबदबा बनाए हुए है तो बाबा और साधु-संतो का राजनीतिक दखल भी लोकतंत्र को कमजोर ही कर रहा है। विदेशों मे जुर्म साबित होने पर उन्हें अपने पद से हटना पडता है । यहां तो बस चोरी और सीनाजोरी का ही दबदबा बना हुआ है । सरकार में रहते हुए, सांसद/मंत्री जितना बढ़बोला होगा वो उतना ही कद्दावर काबिल/ आलिम नेता होगा। कुछ ऐसा ही चलन देखने को मिल रहा है। गंभीर आरोप होते हुए भी मंत्रीमंडल में बने रहना ही वर्तमान राजनीति का उत्कर्ष है। सरकारी ठेकेदारों की राजनीति में घुसपैठ विकास की प्रक्रिया को दीमक सी चाट रही है। कंही पुल ढह रहे हैं तो कहीं सड़कें कागज की परत सी उखड़ रही है। बडे-बडे घोटालों के कारण राजकोष की खुली लूट सरकारी ठेकेदारों व पूंजीपतियों के हाथ लग रही है, अंकुश नाममात्र को कहीं भी नहीं दिखता। यह प्रवृति लोकतंत्र की पवित्रता हेतु कहां तक उचित है ।

कोई भी कानून, कितना ही अच्छा क्यों न हो किंतु उसे व्यवहार मे किस तरह से लाया जाता है, बस यही महत्वपूर्ण है। अराजकता के लिए यह सब शासनदोष ही है। यहां तक की नेता, न्यायाधीशो पर भी दबाव डालकर अपने मन मुताबिक निर्णय दिलवाने का प्रयत्न करते हैं। हाल ही मे एक सांसद मंत्री ने तो राम मंदिर के संदर्भ में यहां तक कह दिया कि सरकार हमारी है, सर्वोच्च न्यायालय भी हमारा है तो मंदिर बनकर ही रहेगा। यहाँ सवाल उठता है कि क्या इस प्रकार के बयानों से तानाशाही की बू नहीं आती। क्या ये जरूरी नहीं कि सरकार अथवा न्यायालय ऐसे समाज विरोधी बयानों पर स्वयं संज्ञान लें?  सरकार के मुखिया अथवा राजनीतिक दल विशेष सदन व मंत्रिमंडल से ऐसे लोगों को बाहर का रास्ता कब दिखायेगी ? जबकि संविधान मे कहा गया है कि कानून की दृष्टि मे सब समान होंगें । इस तरह के हस्तक्षेप होने पर देश व अवाम का फिर क्या होगा,  कहना असंभव है।

ऐसा लग रहा कि भाजपा सरकार विरोधी-पक्ष को कुचलने की बात को छोड़कर, कब और कैसे विकसित होगी? जबकि पक्ष और प्रतिपक्ष को साथ लेकर देश के विकास को आगे बढाना ही लोकतंत्र की न्यायिक प्रक्रिया है। भाजपा द्वारा दिया नारा " कांग्रेस मुक्त भारत " अपने आप में एक अराजक नारा है, यह लोकतंत्र के सिद्धांत को ही खारिज करता है। जिन देशों मे संसदीय लोकतंत्र है, क्या वंहा अनेक दल नहीं है ? फिर सरकार को महागठबंधन से भय किस चीज का और कैसा ? ये भी एक विचारणीय प्रश्न है।

ऐसे दबावतंत्र का प्रयोग करने वाली सरकार, आग के साथ क्यों खेल रही है? वही बात पूंजीपतियों की है...पूंजीपति किसी एक दल को चुनाव निधि देकर स्वयं का आधिपत्य स्थापित करना चाहते हैं। जैसा कि इस समय देखने को मिल रहा है। ध्यान रहे कि इस प्रकार की प्रवृति लोकतंत्र में बहुत ही घातक होती है। उसी भांति सरकारी अधिकारी यदि सत्तारुढ़ दल के सामने झुककर काम करेगें तो चुनाव स्वतंत्र व स्वच्छ नहीं हो पायेगें जो चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी सवाल खडे करेगें । यह भी सच है कि कोई भी सरकार बिना गलती किए कारोबार नहीं कर सकती है। प्रत्येक सरकार से गलती होती है, परन्तु सरकार की गलती बताने व दिखाने के लिए विरोधी दल अथवा प्रतिपक्ष का मजबूत होना एक आवश्यकता होती है। इंगलैंड, केनेडा आदि देशों में विरोधी दल को अधिकृत मान्यता प्राप्त होती है।

आज की भाजपा सरकार चुनाव हेतु प्रतिपक्ष के महागठबंधन को लेकर इतनी आक्रामक और आश्चर्यचकित क्यों है? कांग्रेस या किसी तीसरे मोर्चे के नेताओं को चुनकर संसद/विधानसभा मे भेजना तो जनता के ऊपर निर्भर करता है। भाजपा चुनावी हितों के लिए जितनी आक्रामक होकर वोटो का ध्रुवीकरण करने का प्रयास करेगी, उतनी ही आराजकता समाज मे फैलेगी। वर्तमान सरकार को अपने बड़बोले नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाने के साथ-साथ, तथाकथित राजनीतिक धर्माचार्यों पर अंकुश भी लगाने का काम ही नहीं अपितु हिंसक हो रहे भीडतंत्र पर भी कसकर लगाम भी लगानी होगी। लेकिन वर्तमान सरकार ऐसा कुछ करने में नितांत असफल ही नजर नहीं आ रही बल्कि इसके विपरीत असामाजिक गतिविधियों को खुला समर्थन दे रही है, ऐसा लगता है।  

[ लेखक प्रख्यात अम्बेडकरवादी कवि/ चिंतक विचारक है । ]


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