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आगामी कैराना लोकसभा उपचुनाव- क्या एसपी-बीएसपी के चक्रव्यूह से बच पाएगी बीजेपी ?

आगामी कैराना लोकसभा उपचुनाव का विश्लेषण :-

उपचुनाव की तैयारी:
गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव के चौकानेवाले नतीजों के बाद उत्तर प्रदेश में लोकसभा का एक और उपचुनाव राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ाए हुए है। 3 फरवरी को कैराना से बीजेपी सांसद हुकुम देव सिंह की मृत्यु के बाद खाली हुई इस सीट पर जल्द ही उपचुनाव का ऐलान हो सकता है। 

विधानसभावार स्थिति :
शामली जिले की इस लोकसभा सीट में थानाभवन, कैराना, शामली विधानसभा सीट शामिल है साथ ही सहानरपुर जिले की गंगोह और नकुड़ विधनसभा सीट इसमें आते है। 
2017 विधानसभा चुनावों में कैराना विधानसभा छोड़ कर अन्य सभी विधानसभा सीटों पर बीजेपी को जीत हासिल हुई थी।
लेकिन इनमें एक बात साफ देखी जा सकती है कि सभी सीटों पर अगर सपा, बसपा, कांग्रेस और आरएलडी के वोट मिला दिए जाए तो वो भाजपा के सभी प्रत्याशियों से कहीं ज्यादा है। 
इनमें से गंगोह विधानसभा सीट पर तो 2017 में सपा और कांग्रेस ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था और बीजेपी के प्रत्याशी प्रदीम कुमार से 10 हजार वोट ज्यादा प्राप्त किए थे। 
वहीं कैराना लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा के हुकुम सिंह को 5,65,909 मत प्राप्त हुए थे और उन्होंने सपा प्रत्याशी पर करीब 2,35,000 वोटों से जीत दर्ज की थी। लेकिन अगर सपा, बसपा और कांग्रेस को मिले वोट जोड़ दिए जाए तो भाजपा की जीत का अंतर बेहद मामूली हो जाता है। 

समाजवादी पार्टी की रही है दमदारी:
हुकुम सिंह से पहले सपा के मुनव्वर हसन कैरान से सांसद हुआ करते थे। उनकी सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। इसके बाद हुए लोकसभा उपचुनाव में मुनव्वर हसन की पत्नी तब्बसुम ने हुकुम सिंह को हरा दिया था। 

जातीय समीकरण:
कैराना लोकसभा सीट एक मुस्लिम एवं गुर्जर बहुल सीट है,। यहां लगभग 3 लाख गुर्जर हैं। खास बात ये है कि इनमें आधे मुस्लिम गुर्जर हैं। मुस्लिमों की कुल संख्या यहां 40 फीदसी के करीब है। साथ ही दलित, जाट भी भारी संख्या में उपस्थित है। 

भाजपा की मुश्किल :
हुकुम सिंह की बेटी और संभावित उम्मीदवार मृगांका सिंह पहले ही भाजपा लहर में यहां से 2017 का विधानसभा उपचुनाव हार चुकी है। हुकुम सिंह के रहते यहां अन्य कोई भाजपा नेता बड़ा चेहरा नहीं बन सका है। यूपी सरकार में मंत्री सुरेश राणा इसी लोकसभा क्षेत्र की एक अन्य विधानसभा सीट थानाभवन से विधायक हैं। उनके ऊपर बीजेपी को जिताने की जिम्मेदारी होगी।

विपक्ष की चुनौती:कागज पर नजर आने वाले विपक्षीय एकजुटता के मजबूत समीकरण जमीन पर उतारना आसान नहीं होगा।आरएलडी भी ये सीट जयंत चौधरी के लिए चाहती है।बीएसपी के उपचुनाव नहीं लड़ती लेकिन सपा को उसका समर्थन राज्यसभा सीट पर उसके प्रत्याशी की जीत पर निर्भर रहेगा।कांगेस, आरएलडी और बसपा भी सपा के सामने सीट की दावेदारी कर सकती है। एसे में आगे की दूरगामी रणनीति को देखते हुए सपा पर ये सीट छोड़ने का भी दवाब होगा।

निष्कर्ष:अगर बीजेपी को एकजुट विपक्ष का सामना करना पड़ा तो उसे कैराना में भी हार का सामना करना पड़ सकता है। अकेले हिंदू कार्ड पर इस बार जीत संभव नहीं। गन्ना किसानों के लिए किए योगी सरकार के काम इस चुनाव में अहम भूमिका निभाएंगे। अगर किसान भाजपा से वाकई संतुष्ट है तो कैराना में कमल खिल सकता है। 

लेखक मोहित चोपड़ा स्वतंत्र पत्रकार  हैं, लंबे समय से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े रहे हैं, अभी समाजवादी पार्टी से जुड़े हैं।


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