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चिट्ठी-पत्री की परंपरा और प्रधानमंत्रियों की गंभीरता

15 साल पहले एक अत्याचारी, बलात्कारी बाबा से छिपाकर उस दौर के प्रधानमंत्री को एक चिट्ठी लिखी गई जिसका सच 15 साल बाद सामने आ पाता है। सिर्फ इसलिए कि उस समय के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने मामले की गंभीरता को समझा और जांच के आदेश दिए, जिसके बाद हरियाणा में सिरसा सेशन कोर्ट को मामला सौंपा गया। ये बिल्कुल सही और ईमानदार प्रक्रिया थी। 

चिट्ठी बहुत ही ताकतवर और रसूख रखने वाले डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख बाबा राम रहीम के खिलाफ थी। चिट्ठी को दुनिया के सामने लाने वाले ‘पूरा सच’ के पत्रकार राम चंदेर छत्रपति की बाबा के खिलाफ साध्वी की चिट्ठी छापने के 20 दिन बाद ही घर से बुलाकर पांच गोलियां मारी गई और  21 नवंबर 2002 को छत्रपति की इलाज के दौरान दिल्ली के अपोलो अस्पताल में मौत हो गई थी। ये केस भी फिलहाल कोर्ट में चल रहा है। वे पुलिस से बार-बार अपना बयान लेने की गुहार लगाते रहे, लेकिन हरियाणा  पुलिस ने उनका बयान तक लेना मुनासिब नहीं समझा। 2003 में मामला सीबीआई को सौंपा गया और सीबीआई के अधिकारी सतीश डागर ने जांच की शुरुआत की। उनकी हिम्मत की दाद देनी होगी, जिन्होंने लाख दबावों के बावजूद साध्वी को खोज निकाला और उन्हें बयान देने के लिए तैयार किया और मामले को आगे बढ़ाया। कोर्ट में सुनवाई के दौरान मामले से जुड़ी साध्वियों को सही सलामत ले जाना उनकी ही जिम्मेदारी होती थी। जबकि हर सुनवाई पर बाबा के गुंडों का हुजूम उन्हें धमकियां देता था, लेकिन वे डंटे रहे...अड़े रहे। साफ है कि कुछ गिने चुने लोगों की वजह से ही दोगले बाबा का काला सच सबके सामने आ सका। ऐसे में ये बात और भी मायने रखती है जब तत्कालीन और मौजूदा सरकारें डेरा सच्चा सौदा प्रमुख के चरण वंदन में लगी हुई थीं, चाहे इनेलो की सरकार हो या कांग्रेस की सरकार या फिर बीजेपी की । तीनों को कभी बाबा में कोई अपराधी नज़र नहीं आया उल्टा वो बाबा को बचाने के रास्ते बनाती रहीं। लेकिन सिर्फ एक प्रधानमंत्री की गंभीरता ने मामले को आगे बढ़ाया और लाख बाधाओं के बावजूद मामला सही अंजाम तक पहुंच सका।

अब दूसरी चिट्ठी लिखी जाती है वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को, जो जस्टिस कर्णन ने लिखी, जिसमें उन्होंने अपने साथी जजों के खिलाफ जातिवादी मानसिकता के चलते भेदभाव के आरोप लगाए थे ।  23 जनवरी 2017 को जस्टिस कर्णन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी थी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट और मद्रास हाईकोर्ट के जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए थे, चिट्ठी में 20 जजों और सेवानिवृत्त जजों के नाम भी दिए गए थे, जिनके खिलाफ जांच की मांग की गई थी । दरअसल सारा मामला शुरू यहीं से होता है जब एक हाईकोर्ट के जज न्यायिक व्यवस्था में जातिवाद और भ्रष्टाचार देखते हैं, महसूस करते हैं और अपनी ज़िम्मेदारी निभाते हुए प्रधानमंत्री को पत्र लिखते हैं कि इसकी जांच होनी चाहिए और इसके लिए वो नाम और सुबूत भी प्रधानमंत्री को देते हैं, लेकिन यहां प्रधानमंत्री की गंभीरता बिल्कुल उलट है। प्रधानमंत्री मोदी वो चिट्ठी उसी विभाग को भेज देते हैं, जिसके ख़िलाफ़ चिट्ठी लिखी गई।  यहां सवाल उठता है कि जब किसी हाईकोर्ट के जज ने न्यायिक व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार और जातिवाद के खिलाफ जांच की मांग की है, और वो खुद भी उससे पीड़ित हैं तो क्या वो प्रक्रिया पूरी नहीं होनी चाहिए। क्या मामले की जांच के लिए संबंधित जांच ऐजेंसी को आदेश नहीं देने चाहिए थे। लेकिन प्रधानमंत्री जी संज्ञान लेने की जरूरत तक महसूस नहीं करते । क्या प्रधानमंत्री नहीं चाहते कि न्यायिक व्यवस्था में पल रहा भ्रष्टाचार खत्म हो, शायद नहीं, अगर चाहते तो जस्टिस कर्णन की चिट्ठी को सही हाथों में देते और निष्पक्ष जांच करवाते।   

अगर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी वो चिट्ठी उसी को भिजवा देते जिसके खिलाफ चिट्ठी लिखी गई थी, तो क्या इतना बड़ा सच हमारे सामने आ पाता, शायद ये फर्क है सोच का और गंभीरता का ।  जो साफ समझी और देखी जा सकती है । एक प्रधानमंत्री समस्या को खत्म करना चाहते थे और पीड़ित को न्याय दिलाना चाहते थे, लेकिन वर्तमान में समस्या को नज़रअंदाज़ करना आपकी मंशा और गंभीरता ज़ाहिर करता है।  


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