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उत्तरकाशी में वन गुजरों को बेघर करने की तैयारी, सतलुज जल विद्युत परियोजना प्रबंधन ने 3 दिन के अंदर घर खाली करने के दिए निर्देश

उत्तराखंड में राज्य सरकार वैसे तो वन गुजरों को स्थाई घर देने और उनके विकास के लिए विभिन्न योजनाएं चला रही हैं, लेकिन उत्तरकाशी में रहने वाले वन गुजर समाज के लोगों के बसेरे उजाड़ने की तैयारी की जा रही है। यहां मोरी और नैटवाड़ क्षेत्रों में रहने वाले वन गुजर परिवारों को सतलुज जल विद्युत परियोजना प्रबंधन ने 3 दिन के अंदर अपने-अपने घर खाली करने और मवेशियों को हटाने का फरमान सुनाया गया है।  

उत्तरकाशी में मोरी और नैटवाड़ क्षेत्रों में करीब 50 सालों से निवास कर रहे 16 वन गुजर परिवारों के लोग इन दिनों अपने आशियाने को लेकर बेहद चिंतित हैं। यहां सतलुज जल विद्युत परियोजना प्रबंधन ने इन्हें बाकायदा नोटिस भेजकर 3 दिन के अंदर अपने-अपने घर खाली करने और मवेशियों को हटाने के निर्देश दिए गए हैं। सतलुज जल विद्युत परियोजना प्रबंधन के इस नोटिस को लेकर वन गुजर परिवारों के लोग बेहद परेशान हैं, इन्होंने उत्तरकाशी के जिलाधिकारी से मिलकर न्याय की गुहार लगाई है। इन वन गुजर परिवारों का कहना है कि हम बहुत मुसीबत हैं,ऐसी ठंड में हम अपने बच्चों और मवेशियों को कहां लेकर जाएंगे। इनके साथ इलाके के स्थानीय लोग भी आ गए हैं, इन्होंने भी जिला प्रशासन से वन गुजरों को नया ठिकाना दिए जाने की मांग की है। वहीं जिलाधिकारी ने भी प्रभावित वन गुजरों को पूरी मदद का भरोसा दिया है। 


जानकारी के मुताबिक उत्तरकाशी का टौंस वन प्रभाग पिछले 50 सालों से 16 वन गुजर परिवारों को उनके मवेशियों समेत परमिट जारी करता आ रहा है। इसी परमिट के आधार पर ये लोग हिमाचल प्रदेश-उत्तराखंड की सीमा से सटे क्षेत्रों में वन विभाग की भूमि पर अपना घर बनाकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। लेकिन इन्हें अब सतलुज जल विद्युत परियोजना के नाम पर जगह खाली करने का दवाब बनाया जा रहा है। 

जी हां उत्तरकाशी के इन वन गुजरों के दर्द को समझा जा सकता है कि इस कड़कड़ाती ठंड के मौसम में बेघर करने वाला आदेश वास्तव में हैरानी भरा है। यहां सवाल उठाना जरूरी हो जाता है कि वैसे तो केंद्र सरकार और राज्य सरकार हर गरीब को छत देने का वादा करते नहीं थक रही हैं, लेकिन यहां सरकारों की कथनी और करनी में अंतर साफ दिख रहा है कि उनके लिए परियोजनाएं ज्यादा जरूरी हैं। यहां हम ये नहीं कह रहे कि विद्युत परियोजनाओं के लिए काम न हो, जरूर होना चाहिए, क्योंकि ये काम जनता के हित में ही हो रहा है, लेकिन सरकारों को ये भी ध्यान रखना होगा कि इन परियोजनाओं से जो लोग उजाड़े जा रहे हैं या प्रभावित हो रहे हैं, उन्हें विस्थापित करने की जिम्मेदारी भी तो सरकार को ही उठानी होगी।
 

कौन हैं वन गुजर...

देव भूमि समाचार में प्रकाशित लेख में ज्योति सिंह राना और राज शेखर भट्टे के द्वारा वन गुजरों पर किए गए सामाजिक और सांस्कृतिक अध्ययन के अनुसार हिचाल प्रदेश और उत्तराखंड में ज्यादातर वन गुजर खानाबदोश की जिंदगी जीते हैं। ये लोग जंगलों में रहते हैं और जानवरों को चराने वाले मुस्लिम धर्म से संबंध रखते हैं। इनका हिन्दू गुर्जरों से कोई नहीं रिश्ता था, समानता भी नहीं मिलती।
 
वन गुजर अपने धर्म में भरोसा बहुत है। यह लोग सच्चे मुस्लिम की तरह दिन में पांच बार (अशर, जौहर, मगरिब, ईशा और फज्र) नमाज अदा करते हैं। तथा शराब और नशीले पदार्थों के सेवन से दूर रहते हैं। इनके परिवार की प्रकृति पितृसत्तात्मक है। ज्यादातर एकाकी परिवार से संबंध रखते हैं। सभी के पास कच्चे छत वाली झोपड़ी है, जिन्हें वह डेरा कहते हैं। ज्यादातर वन गुजर अपने जानवर पालते हैं और इनके पालन का जरिया दूध व दूध से उत्पाद बेचकर अपना जीवन-यापन करते हैं। साथ ही कुछ वन गुजर जीवन-यापन करने के लिए मजदूरी करते हैं। अधिकांश वन गुजर मानते हैं कि शादी में दहेज का प्रचलन है और वह दहेज के रूप में एक-दूसरे को भैंस देते हैं।
 
वन गुजर समाज में लड़कों को अधिक महत्व दिया जाता है परन्तु अधिकांश वन गुजरों में लड़का-लड़की दोनों को समानता की दृष्टि से देखा है। इनके बच्चे पढ़ाई करने नहीं जाते हैं, क्योंकि उनके आस-पास शिक्षा का साधन उपलब्ध नहीं है। यह लोग अपने डेरे अर्थात अपने निवास स्थान में कमरे के बीचों -बीच एक चूल्हे का निर्माण करते हैं। जिससे कि रात्रि के समय में इनकी जानवरों से सुरक्षा हो सके और इनका कमरा गर्म रहे। पलायन का असर इनकी परम्परा में नहीं पड़ता है। इनकी परम्परा में कोई नृत्य और गीत नहीं है और न ही वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया जाता है।  अधिकांश वन गुजर समुदाय में बाल विवाह की परम्परा है। बचपन में ही विवाह तय कर दिया जाता है, परन्तु पति के साथ रहन-सहन 18 वर्ष की उम्र के बाद ही होता है। वन गुर्जर महिलायें अपने द्वारा बनाये गए आभूषणों को पहनती हैं, जो कि इनके पूरे समुदाय में बरसों से किया जा रहा है। अपने स्वयं के इस्तेमाल के लिए यह लोग झाडू भी स्वयं बनाते हैं। इन लोंगों में पर्दा प्रथा का भी प्रचलन नहीं है।


क्या है सतलुज जल विद्युत परियोजना...

सतलुज जल विद्युत निगम लिमिटेड (पूर्व नाम, नाथपा झाकड़ी पावर कारपोरेशन लिमिटेड - एनजेपीसी) की स्थापना 24 मई 1988 को हिमाचल प्रदेश में सतलुज बेसिन और किसी भी अन्य स्थान पर परियोजनाओं की आयोजना कर इनके सर्वेक्षण से लेकर निर्माण तक के कार्य करने एवं इनका परिचालन व रख-रखाव करने हेतु भारत सरकार तथा हिमाचल प्रदेश सरकार के संयुक्त उपक्रम के रूप में की गई। इसके अतिरिक्त एसजेवीएन उत्तराखंड राज्य में  59 मेगावाट की नैटवाड़, मोरी तथा 45 मेगावाट की जाखोल सांकरी जल विद्युत परियोजनाओं का भी निर्माण कर रहा है। 

सतलुज जल विद्युत परियोजना से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक परियोजना से प्रभावित गांवों की युवतियों के जन्म पर दस हजार, विवाह पर 20 हजार की आर्थिक सहायता दी जाएगी साथ ही कृषि क्षेत्र में प्रति हेक्टेयर बीज, खाद क्रय करने को दस हजार रुपये की सहायता की जाएगी। इसके अलावा प्रति वर्ष प्रभावित परिवारों के 40 युवक-युवतियों को निगम की ओर से आईटीआई में मुफ्त प्रशिक्षण के साथ ही छात्रवृत्ति भी प्रदान की जाएगी। मेडिकल और डिग्री की कक्षाओं के चार छात्रों को हर महीने तीन हजार रुपये की छात्रवृत्ति देने का प्रावधान रखा गया है।  परियोजना प्रबंधक ने बताया कि प्रभावित गांव के प्रति परिवार को 10 वर्षो तक सौ यूनिट बिजली निशुल्क और परिवार नियोजन पर 5 हजार की आर्थिक सहायता दी जाएगी तथा योग्यतानुसार बेरोजगार को परियोजना में रोजगार भी दिया जाएगा। 

मुख्य संवाददाता
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