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जयंती विशेष- सामाजिक क्रांति के अग्रदूत :संत शिरोमणि गुरु रविदास

हिंदी साहित्य के मध्यकाल के पूर्वार्द्ध को भक्तिकाल के नाम से अभिहित किया जाता है | यह मध्यकालीन भारत की दीनता , धार्मिक अंधविश्वासों एवं सामाजिक विकृतियों का काल था | इस काल में एक ओर जहाँ विदेशी आक्रान्ताओं के जुल्म बढ़ते जा रहे थे, वहीं हिन्दू धार्मिक रूढ़ियों के आधार पर और अधिक बंटते जा रहे थे. जिसके कारण भारत का सामाजिक ढांचा पूर्णत: अस्त व्यस्त हो गया था. कुल मिलाकर यह धार्मिक, राजनीतिक और सामाजिक पतन का काल था. जिसका स्वाभाविक परिणाम भारत की परतंत्रता थी. ऐसे ही समय में दीन हीन भारत की दु;खी जनता को सामाजिक स्वास्थ्य के लिए समता की संजीवनी पिलाने के लिए भारत भूमि पर संत शिरोमणि रविदास का आविर्भाव हुआ था.

 संत शिरोमणि रविदास का जन्म सम्वत 1433 वि.की माघ पूर्णिमा को बनारस के पास ‘मांडूर’ नामक स्थान पर हुआ था. अब इसका नाम मडुवाडीह हो गया है. संत रविदास की माँ का नाम कर्माबाई तथा पिता का नाम राघवदास था. उनकी पत्नी का नाम लोना था. उनका परिनिर्वाण सम्वत 1584 वि.में चितौड़गढ़ में हुआ था.

सन्त शिरोमणि रविदास क्रांतिकारी, समाजसुधारक, दार्शनिक, भक्त और कवि थे. इसलिए उन्हें जयदेव, नामदेव, गुरुनानक, कबीर आदि महान सन्तों की अविरल परम्परा की एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है. अत: उनके सर्जनात्मक व्यक्तित्व का मूल्याँकन भी इसी परिप्रेक्ष्य में रखकर किया जाना चाहिए.

सन्त रविदास के चालीस पद तो सिक्खों के पवित्र ग्रन्थ ‘ गुरूग्रथ साहब ‘ में संकलित हैं तथा अन्य पांडुलिपियों से दो सौ के लगभग पद तथा ढाई सौ से अधिक साखियाँ तथा एक अन्य ग्रन्थ ‘ प्रहलाद चरित ‘ भी प्राप्त हो चुके हैं. अब विद्वानों का ध्यान इस ओर गया है और वे सोचने लगे हैं कि ‘ सन्त रविदास के काव्य का अध्ययन किए बिना सम्पूर्ण सन्त काव्य का अध्ययन अधूरा है |’ 

मध्यकालीन भारत अंधविश्वासों के अंधेरों में साँस ले रहा था. कुछ बेबुनियाद रूढ़ियों ने उसमें और सड़न पैदा कर दी थी. सन्त रविदास ने इन रूढ़ियों के विरूद्ध विद्रोह का शंखनाद कर दिया. इसीलिए उन्हें सामाजिक क्रांति का अग्रदूत कहा जाता है. तत्कालीन समय में विदेशी आक्रान्ताओं से यहाँ के मूलनिवासी भारतीय हिन्दू और मुसलमान दोनों ही परेशान थे. इसलिए इनसे मुक्ति पाने के लिए सर्वप्रथम सन्त रविदास ने हिन्दू और मुसलमानों में एकता स्थापित करने का प्रयास किया. उन्होंने हिन्दू और मुसलमानों के बीच की सैद्धांतिक दरार को पाटकर ‘ राम और रहीम ‘ को एक घोषित किया तथा ‘ वेद और कुरान ‘को बराबर सम्मान देने का आह्वान किया. मन्दिर और मस्जिद के झगड़े आज की तरह तब भी हिन्दू और मुसलमानों को दो फाड़ कर रहे थे, लेकिन सन्त रविदास ने इन दोनों को समान बताकर आपस में न लड़ने की सलाह दी.

दरअसल सन्त रविदास व्यक्ति– व्यक्ति की समानता के हामी थे. उन्होंने बताया कि प्रत्येक व्यक्ति जन्मत: एक समान है. सबमें एक ही रंग का रक्त है, एक ही प्रकार का मांस और अस्थियाँ हैं. फिर इस संसार में आकर व्यक्ति, धर्म, जाति, वर्ण आदि के नाम पर क्यों बंटें ? सन्त रविदास ने इस बुनियादी तथ्य को जनता के सम्मुख रखा और सबको मिलजुल कर देश की उन्नति के लिए कार्य करने का उपदेश दिया. उनके यह उपदेश तत्कालीन परिस्थितियों में जितने आवश्यक थे , आज की परिस्तितियों में भी उतने ही प्रासंगिक हैं. क्योंकि भौतिक दृष्टि से इतनी वैज्ञानिक उन्नति कर लेने के बाद भी धार्मिक अन्धविश्वास पूरी तरह से समाप्त नहीं हो पाए हैं. आज भी मन्दिर और मस्जिद को लेकर राम और खुदा के नाम पर साम्प्रदायिक दंगें निरंतर हो रहे हैं. दलितों पर अत्याचार की बाढ़ सी आ गई है.ऐसी स्थिति में सन्त रविदास के काव्य से सबक लेना आवश्यक है. 

वर्ण व्यवस्था हिन्दू धर्म का कोढ़ है, जाति इस कोढ़ में और खाज! भारत का यह दुर्भाग्य रहा है कि यहाँ जाति ही व्यक्ति का सामाजिक स्तर तय करती रही है. उसे ऊंच और नीच मानने और मनवाने को बाध्य करती रही है. सन्त रविदास ऐसी जाति प्रथा को जो व्यक्ति–व्यक्ति को जोड़ती नहीं तोड़ती है. रोग मानते हैं. उनकी दृढ मान्यता है कि जब तक इस देश से जाति प्रथा समाप्त नहीं हो जाती,  तब तक इसमें किसी प्रकार के सुधार की बात करना बेबुनियाद है. कोई ऊंचे कुल में जन्म लेकर महान हो जाए, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है. किन्तु कोई साधारण आय वर्ग तथा सामाजिक दृटि से हेय समझे जाने वाले कुल में उत्पन्न होकर महान हो जाए, यह अपने आप में आश्चर्य की बात है. सन्त रविदास इस तत्थ का एक जीवंत उदाहरण हैं. उनकी इस महानता का एक ही रहस्य है और वह है उनकी श्रम के प्रति आस्था. निष्क्रियता व्यक्ति को हर स्तर पर तोड़ देती है. इसलिए सन्त रविदास व्यक्ति को सदैव नेक नियत से कर्मशील रहने का उपदेश देते हैं. इस निष्काम कर्मयोगी सन्त ने गृहस्थ जीवन का निर्वाह करते हुए सदाचार के शाश्वत सिद्धांतों का प्रचार किया और ‘ परम पद ‘ प्राप्त किया. 

उस समय भारत विदेशी शक्तियों का गुलाम था और दलित (शूद्र) विदेशी शक्तियों के साथ ही सवर्ण हिन्दुओं का भी गुलाम था. यह दोहरी गुलामी सन्त रविदास को भी खली तथा उन्होंने इस पराधीनता को पाप बताते हुए कहा कि पराधीन व्यक्ति को सब ही हीन समझते हैं तथा ऐसे व्यक्ति को कोई भी प्रीत नहीं करता है. पराधीन व्यक्ति का कोई भी धर्म नहीं होता है. इसलिए समस्त दलितों को हिन्दू धर्म की इस गुलामी से मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए–

“पराधीनता पाप है , जान लेहू रे मीत |
रविदास दास पराधीन सों कौन करै है प्रीत || 

पराधीन को दीन क्या , पराधीन बेदीन | 
रविदास दास पराधीन को सबहिं समझत हीन || “


इन साखियों में सन्त रविदास के मन में छिपी विद्रोह की चिंगारी स्पष्ट परिलक्षित होती है. सत्य भी है ऐसा संघर्षजीवी व्यक्ति किसी भी प्रकार की परतन्त्रता कहाँ स्वीकार कर सकता है. सन्त रविदास एक ऐसे राज्य की कल्पना करते हैं, जहाँ पर प्रत्येक व्यक्ति को अन्न मिले तथा सब मनुष्य बराबर हों ,किसी प्रकार की ऊँच–नीच न हो, सब लोग प्रसन्न रहें. इसलिए उन्होंने अपने काव्य ग्राम का नाम भी ‘ बेगमपुरा ‘ दिया है. जहाँ पर किसी प्रकार का कोई गम न हो .कुल मिलाकर वे एक साम्यवादी समाज व्यवस्था की कल्पना करते हैं –

‘’ ऐसा चाहों राज मैं , जहाँ मिले सबन को अन्न |
छोट बड़ों सब सम बसें ,रविदास रहें प्रसन्न ||

सन्त रविदास का जीवन और काव्य उदात्त मानवता के लिए आवश्यक सदाचार और जीवन मूल्यों का अक्षय भंडार है, जिसमें से प्रत्येक वर्ग और स्थिति तथा मानसिक स्तर का व्यक्ति अपने लिए सुन्दर–सुन्दर मोतियों का चुनाव कर सकता है.

सम्पर्क : “ विमर्श ”110 ,विनोद विहार ,मल्हीपुर रोडसहारनपुर – 247001 (उ.प्र.)
E.Mail- drnsingh27@gmail.com
Web.site-  WWW.drnsingh.com


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