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क्रांति ज्योति सावित्रीबाई फुले की जयंती पर शत्-शत् नमन

सावित्रीबाई फुले की जयंती पर विशेष...  
महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव नायगांव में 3 जनवरी 1831 को जन्मी सावित्रीबाई फुले पूरे देश के लिए गौरव है। जिस कालखंड में उनका जन्म हुआ, वह समय भारतीय समाज में शुद्र-दलितों के साथ भयंकर छुआछूत, भेदभाव, हिंसा और अत्याचार का समय था। मनु स्मृति के आधार पर हिन्दू समाज में वर्गभेद और जातियों में ऊंच-नीच की भावना थी। ब्राह्मण श्रेष्ठ और पूजनीय माने जाते थे। वे समाज में मनमाने नियम बनाते थे। धर्मनीति और पाक का भय दिखाकर वे लोगों से उन नियमों का पालन करवाते थे। स्त्रियों को भी न्याय प्राप्त नहीं था। उन्हें शिक्षा, संपत्ति, स्वतंत्रता, समता-सम्मान का अधिकार नहीं था। स्त्रियां और शूद्र इन सब अधिकारों से वंचित रखे थे। समाज में बाल-विवाह की प्रथा थी। ऐसे समय में 1840 में सावित्रीबाई का बाल विवाह ज्योतिबा फुले के साथ हुआ। यह सावित्रीबाई फुले के जीवन की महत्वपूर्ण घटना थी। सावित्रीबाई ज्योतिराव के साथ मिलकर क्रांति की महान ज्योति बन जाएंगी, यह बात उस समय कोई नहीं जानता था। फुले दंपति ने अपने समस्त सुख और सुविधाओं का बलिदान कर समाज सेवा के कार्य के ले खुद को समर्पित कर दिया।

         
सावित्रिबाई फुले ने अपने पति से पढ़ना-लिखना सीखा और लगातार अध्ययन कर आगे की शिक्षा पूरी की। पति और स्वयं के प्रयत्नों से वे शिक्षिका बन गई। इसके बाद तो बालिकाओं और स्त्रियों को शिक्षित करना उनके जीवन का उद्देश्य बन गया। इसके साथ वे समाज की कुरीतियों और छुआछूत को मिटाने व विधवा विवाह हेतु लगातार संघर्षरत रहीं। उन्होंने अवैध शिशु हत्या रोकने के लिए शिशु गृह की स्थापना थी। उन्होंने समाज में समतावादी मानवतावादी विचारों का व्यापक प्रचार एवं प्रसार किया। अकाल और महामारी के समय पीड़ितों की सेवार कर सावित्रीबाई ने यह साबित कर दिया वह बहुत ही परिश्रमी, दृढ़ निश्चयी और परोपकारी महिला थीं। महिलाएं धर्मभीरू, अंधविश्वासी और पंरपरावादी होती हैं, इस बात को उन्होंने अपने कार्यों से गलत साबित कर दिया था। वे बचपन से ही बहुत साहसी और निर्भीक थीं । ज्योतिबा का प्रोत्साहन और शिक्षा के अमोघ अस्त्र से उन्होंने अपने परिवर्तनवादी-क्रांतिकारी विचारों का परिचय दिया। ससुराल और समाज से बहिष्कार, विरोध, अत्याचार, अपमान जनक टीका-टिप्पणियां , गालियां, हमले और तरह- तरह प्रताड़नाएं उन्होंने समाज की अन्यायपूर्ण, विषमतावादी, घृणित परम्पराओं और कुरीतियों को जड़ से मिटाने की खातिर सहीं थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, भारतीय संविधान में स्त्रियों को मिले अधिकारों के अनुसार और बाबा साहेब अंबेडकर के लगातार प्रयत्नों के कारण जैसे-जैसे स्त्रियों को महत्व मिलता गया, वैसे ही उनके कार्यों का मूल्यांकन भी नई दृष्टि से किया जाने लगा। ठीक इसी प्रकार सावित्रीबाई के सामाजिक क्रांतिकारी कार्यों का मूल्यांकन भी अलग से किया गया। दरअसल समाज सुधार और नारी जागृति के क्षेत्र में उनके द्वारा किए गए कार्य अनूठे है। सही मायने में समाज परिवर्तन के लिए क्रांति की शुरुआत उसी समय से हुई थी।


सावित्रीबाई फुले का महाराष्ट्र में नारी जागृति के क्षेत्र में बहुत सम्मान है । उन्हें क्रांति मां और नारी मुक्ति आंदोलन की जननी कहा जाता है। इस देन के लिए नारी जाति उनकी ऋणी है। नारी उद्धार से जुड़ीं , महिला जागृति मुक्ति आंदोलन की महिला कार्यकर्ता और समाज सेविकाएं आज सर्वप्रथम सावित्रीबाई और ज्योतिबा को नमन करती हैं। महिला मुक्ति आंदोलन से जुड़ी महिलाओं और संस्थाओं ने सावित्रीबाई के व्यक्तित्व और कृतित्व की जानकारी पूरे देश में पहुंचाने का प्रयास किया है और यह प्रक्रिया आज भी जारी है।
‘पड़ताल’ परिवार क्रांति मां और नारी मुक्ति आंदोलन की जननी सावित्रीबाई फुले की जयंती पर शत्-शत् नमन और विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
      

मुख्य संवाददाता
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