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मॉब लिंचिंग 'डिवाइड एंड रूल’ का सबसे बड़ा तात्कालिक हथियार

कुछ दिन पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि गाय के नाम पर हत्या "स्वीकार्य नहीं" है। लेकिन उनकी इस बात का उनके अपने लोगों पर कितना असर हुआ?...तनिक भी नहीं। उनकी इस टिप्पणी के कुछ ही घंटे बाद कथित तौर पर भीड़ ने एक मुस्लिम व्यक्ति को मार डाला। भीड़ में शामिल लोगों का इल्जाम था कि वो व्यक्ति अपनी कार में बीफ़ ले जा रहा था। प्रधानमंत्री मोदी के शासनकाल में गाय सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पैदा करने वाला राजनीतिक जीव बन चुका है। नतीजतन हिन्दू और मुसलमानों यानि कि धर्मों के बीच खाई गहरी होती जा रही है। गाय की बिक्री और बूचड़खानों पर लगी पाबंदियों ने इसे और हवा दी है। पता नहीं कि हम कैसे और किस प्रकार के हिंसक लोग हो गए हैं। कभी गाय के नाम पर, कभी लव जिहाद के नाम पर, कभी जातिगत विद्वेष के नाम पर तो कभी भाषाई मतभेद के नाम पर इंसान ही इंसान को मारने पर लगे हैं। और बच्चा चोर बताकर लोगों को भीड़ द्वारा मार दिए जाने की खबरें जोरों पर हैं। जब मोदी जी हिंसा की निंदा कर रहे थे, तभी झारखंड का अलीमुद्दीन मारा गया था। मरी गाय पर बवाल हुआ तो उस्मान का घर फूंक दिया गया। बीबीसी का मानना है कि भारत में भीड़ के हाथों हत्या यानि मॉब लिंचिंग के मामलों में हुए इजाफे ने समूचे समाज को परेशान कर रखा है। ज्यादातर बीजेपी शासित प्रदेशों में मुसलमान हिंदूओं की भीड़ के हाथों मारे जा रहे हैं। उनके ऊपर बीफ़ रखने का इल्ज़ाम लगाकर इस प्रकार की हत्याओं को अंज़ाम दिया जा रहा है।

मीडिया रिपोर्टस से इकट्ठा किए गए आकड़ों के आधार पर यह बहस अब और तेज हो गई है कि मोदी सरकार में नफ़रत के नाम पर किए जाने वाले अपराध बढ़े हैं। लेकिन बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह इससे इंकार करते हैं। ... वो तो इंकार करेंगे ही...जवाबदेही से जो बचना है। भाजपा के नेताओं के दिमाग में लोकतंत्र के पिछ्ले 70 साल घर किए हुए हैं... उसमें वो अपने शासन काल के चार साल भी जोड़ लेते हैं। नेहरू और इन्दिरा का भूत ही उनका पीछा नहीं छोड़ रहा है। जब भी उनसे कोई सवाल किया जाता है तो उनका सीधा सा उत्तर होता है कि पिछली सरकारों के दौर में भी तो आज से ज्यादा ऐसा होता था। भाजपा के नेता किसी भी सवाल का उत्तर सवाल खड़ा करके ही देते हैं। मॉब लिंचिग के मामले में भाजपा के शीर्ष नेता का कहना है कि कि पिछली कांग्रेस सरकार में ज्यादा मॉब लिंचिंग हुई थीं। जब एक जानेमाने पत्रकार ने यह कहा कि भारत 'लिंचोक्रेसी' बन चुका है, तब सोशल मीडिया पर उनकी इस टिप्पणी की यह कहते हुए आलोचना की गई कि भारत में भीड़ के हाथों हिंसा और धार्मिक हिंसा का लंबा इतिहास रहा है। उदारवादी हाल की घटनाओं को ज्यादा बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर रहे हैं। बीबीसी ने यह भी बताया कि बीजेपी के एक सांसद और स्तंभकार ने लिखा है, "भारत की सार्वजनिक संस्कृति में हिंसा की प्रवृति हमेशा से रही है और आज़ादी के समय से ही भीड़ के हाथों होने वाली हिंसा की आड़ में राजनीतिक हिंसा होती रही है जो राजनीतिक फायदे और न्याय के लिए होती है।"

बीबीसी द्वारा देश के एक जाने-माने इतिहासकार संजय सुब्रह्मणयम से जब भारत में हिंसा के सांस्कृतिक इतिहास के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि हिंसा को तीन प्रकारों में बांटकर देखना सही होगा। यथा -सामूहिक हत्याएं (किसी जातीय समूह का नरंसहार), भीड़ की हिंसा और सामाजिक मान्यताओं को बचाने लिए होने वाली हत्याएं। संजय बताते हैं कि सामूहिक हत्याओं के दौरान, "एक बहुसंख्यक समाज अल्पसंख्यक समाज को निशाना बनाता है और इस मामले में बड़े स्तर पर हिंसा होती है। ये आम तौर पर बार-बार होती हैं। इसे व्यवस्थित तरीके से अंजाम दिया जाता है और इसमें खास तबके को निशाना बनाया जाता है।" भारत में इस तरह की हिंसा कई बार देखी जा चुकी है। मसलन, 1984 का सिख विरोधी दंगा और 2002 का गुजरात में मुस्लिम विरोधी दंगा इसी तरह की हिंसा के प्रमाण हैं। अक्सर इस तरह की हिंसा में कानून-व्यवस्था से जुड़ी ताकतों की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भूमिका होती है।...इस संदर्भ में अक्सर लोगों का मानना है कि जो लोग इस तरह की वारदातों को अंज़ाम देते हैं, वो मनोरोगी होते हैं और इससे उन्हें ताकतवर होने का मिथ्या बोध होता है। तीसरी तरह की जो हिंसा है, वो आज देश में चिंता की विषय बनी हुई है। संजय सुब्रह्मणयम कहते हैं, "तीसरी तरह की हिंसा वो है जिसमें एक समूह यह मानता है कि कुछ रूढ़िवादी सामाजिक मान्यताओं की किसी भी हालत में सुरक्षा होनी चाहिए। चाहे वो कानून के ख़िलाफ़ ही क्यों ना हो। इस तरह की हिंसा में लोगों को पता होता है कि वो जो कर रहे हैं, वो ग़ैर-क़ानूनी है। लेकिन फिर भी यह महसूस करते हैं कि वो सही है।" ...मेरे विचार से, अक्सर ये लोग वो होते हैं जिन्हें सत्ता का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष साथ मिला होता है। हैरत की बात तो ये है कि भारत में जो कुछ हो रहा है उसे लेकर केंद्र सरकार और राज्य सरकारें आंखें बंद करके बैठी हुई हैं। क्या सरकारों का ऐसा रवैया क़ानून के राज को खोखला करने का काम नहीं कर रहा है?

संजय सुब्रह्मणयम मानते हैं, "इस तरह की हिंसा देश के कई हिस्सों में हो रही है क्योंकि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ, बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद जैसे हिंदू कट्टरवादी संगठन समाज में इस तरह की रूढ़िवादी धारणाओं को बचाने में सक्रिय तौर पर लगे हुए हैं। इसी तरह के कई संगठन मुस्लिम समाज में भी है और वो भी इसी तरह से काम करते हैं।" उनका यह भी मानना है कि इस प्रकार की हिंसा को ख़त्म करना बहुत मुश्किल है क्योंकि यह छिटपुट और अव्यवस्थित तरीके से होती है। यह सिर्फ कानून और उसकी प्रक्रिया में समाज का विश्वास कायम करके ही किया जा सकता है। सख्ती से कानून लागू करके और गुनाहगारों को सज़ा देकर ही इस पर लगाम लगाई जा सकती है। इस प्रकार की हिंसा को अंजाम देने वालों और ऐसे तत्वों को पैदा करने वाले संगठनों पर नज़र रखने की अति आवश्यकता है। लेकिन एक गम्भीर सवाल ये है कि जिनके ऊपर यह जिम्मेवारी है, यानि कि सरकार पर कौन नज़र रखेगा।

यह भी कि हमारे बुज़ुर्ग हमसे कहा करते थे कि जब भी कभी तेज आंधी या तूफान आए तो समूह में रहना चाहिए, यानी दस-पंद्रह लोग एक-दूसरे का हाथ पकड़कर, किसी एक जगह पर जमीन पर बैठ जाना चाहिए। आंधी गुजर जाएगी और समूह आपको सुरक्षा देगा। लेकिन आज जिस तरह से एक समूह उन्मादी भीड़ में तब्दील होता जा रहा है, उससे हमारे भीतर सुरक्षा कम, डर की भावना घर करती जा रही है। भीड़ अपने एक अलग किस्म के तंत्र का निर्माण कर रही है जिसे आसान भाषा में हम भीड़तंत्र भी कह सकते हैं। ये एक ऐसी भीड़ होती है जिसकी न तो कोई विचारधारा है, न ही कोई सरोकार। वो बिना किसी खास कारण के ही कहीं भी किसी भी बात पर आक्रामक हो जाती है और जिस किसी से भी उसको नफरत या घृणा होती है वो उसे उसी वक्त सजा देने का फैसला कर देती है। अक्सर ऐसे फैसले बर्बर ही होते हैं।

आशीष नंदी का कहना है, “राष्ट्रवाद और गौरक्षा जैसी भावनाओं को नुकीला बनाया जा रहा है ताकि लोग आपस में लड़ें। कहा जा सकता है कि मॉब लिंचिंग 'डिवाइड एंड रूल का सबसे तात्कालिक और नया हथियार बनकर उभरा है।” इसका ताजा उदाहरण है कि जितने भी माँब लिंकिंग के मामले हुए हैं उनमें खासकर दलितों और मुसलमानों को आपस में भिड़ाने का का किया गया है। राजस्थान में एक दलित के द्वारा बंगाल के मुसलमान को मरवाने का जो काम किया गया वो इस तथ्य का प्रमाण है। इतना ही नहीं, जयपुर की किसी एक रैली में तो बंगाल के मुसलमान को मारने वाले दलित की एक भव्य झांकी भी निकाली गई। इससे साफ संकेत मिलते हैं कि भाजपा दलितों और मुसलमानों में पनपती भाईबन्दी को तहस – नहस कर देना चाहती है।...कह सकते है कि भाजपा को सबसे बड़ा डर दलितों और मुसलमानों की एकता से है और किसी से नहीं।..... किसी को कोई शक?


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