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स्त्री प्रतिनिधित्व के बिना अधूरा है दलित आंदोलन- रजनी तिलक

रजनी तिलक अपने लेखन के जरिये महिलाओं की आवाज़ को बुलंद करने की दिशा में सार्थक पहल करने में जुटी हैं।  रजनी तिलक का जन्म 27 मई 1958 को पुरानी दिल्ली में जामा मस्जिद के पास कटरा राजाराम में हुआ। महिलाओं की आवाज़ बनने और दलित समाज की सेवा के लिए उन्होंने प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) की नौकरी छोड़ दी। साहित्य का क्षेत्र हो या राजनीतिक,सामाजिक संगठनों का मंच, वो लगातार महिला हिस्सेदारी की आवाज़ पुरजोर तरीके से उठाती रही हैं। उनका ये प्रयास अनवरत जारी है। ‘पड़ताल’ की टीम ने उनसे साहित्यिक, सामाजिक आंदोलन से जुड़े कई पहलुओं पर ख़ास बातचीत की... जिसके कुछ ख़ास अंश आपके लिए पेश हैं।
        


आपकी पारिवारिक पृष्टभूमि क्या रही है, और साहित्य की तरफ आपका रुझान कब और कैसे हुआ ?

मैं बहुत ही साधारण परिवार से संबंध रखती हूं, मेरे पिता जी दर्जी का काम करते थे और दादा जी दिल्ली में घास के ठेके लेते थे, उससे पहले बुलंदशहर में हमारे दादाजी की बहुत जमीन थी, लेकिन ठाकुर समाज के कुछ दबंगों ने उनके साथ धोखा करके उनसे वो ज़मीन हड़प ली। इसी बात से दुखी होकर वो बुलंदशहर से से दिल्ली आ गए। दिल्ली में उन्होंने काम शुरू किया।  सन 1947 में  ब्रिटिश काल के दौरान मेरे दादाजी तांगा चलाने का काम करते थे, इसलिए अंग्रेजों ने  मेरे दादा जी को लाशें ढोने का काम दे रखा था। वे लाशें ढो-ढो कर यमुना नदी तक ले जाते थे। मेरे चाचा जी जो हमेशा मेरे दादा जी के साथ ही रहा करते थे, इतनी लाशें और मारकाट देखकर उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया। एक दिन वो घर छोड़कर चले गए। मेरे पिता जी ने दर्जी का काम सीखा और बाद में काफी लोगों को दर्जी का काम भी सिखाया।  क्योंकि वो चाहते थे कि हमारे लोग अपना पुश्तैनी काम ना करें और सम्मान वाला काम करें। मेरी माता जी घर पर लिफाफे बनाने का काम करती थी, और हम सब भाई बहन भी माता जी के साथ काम करवाते थे।  

आपने किन-किन विधाओं में लिखा है
?
मैंने संपादन बहुत किया है, कहानियां भी लिखती हूं, दो कविता संग्रह भी मेरे हैं, एक आत्मकथा है, महिला मुद्दों, महिला आंदोलन और मानवाधिकार के मुद्दों पर में लगातार लेख लिखती हूं। अभी मेरे दो उपन्यास अधूरे पड़े हैं। अनुवाद भी काफी किया है, मराठी की पांच किताबों को हिंदी में अनुवाद किया है।  



आपकी पहचान ही है आधी आबादी यानी महिलाओं के लिए आवाज़ उठाना
, आपका लेखन भी ज़्यादातर उसी पर केंद्रित रहा है, उससे आप कितनी संतुष्ट है ?
मैं उससे बहुत संतुष्ट हूं, क्योंकि मुझे लगता है कि एक वेक्यूम को मैं भरने की कोशिश कर रही हूं, क्योंकि जितनी भी लेखिकाएं हैं वो भी कभी स्त्री लेखन पर केंद्रित नहीं रहती हैं। क्योंकि वो भी इतनी जागुरुक नहीं हैं कि स्त्री लेखन को भी एक महत्व मिलना चाहिए।  संगठित रूप से जो प्रयास होने चाहिए, उनमें वो शामिल नहीं हो पाती हैं।  

क्या आपने कभी ये महसूस किया है कि उस तरह से दलित समाज की महिलाएँ मुखर नहीं हो पाती हैं, जिस तरह अन्य वर्गों की महिलायें होती हैं
? वो क्यों सामने नहीं आ पाती हैं ?
दूसरे समाज के लोगों का पूरा ध्यान अपने समाज के विकास पर हैं, वो लोग ये मानते हैं कि लड़कियां अगर पिछड़ गईं तो उनके परिवार का विकास रुक जाएगा। हमारे समाज में अभाव शुरू से ही बहुत ज्यादा रहे हैं, इसलिए हमारे पुरुषों को लगता है कि वो बहुत स्पर्धा में हैं, उनको लगता है कि उन्हें पावर मिलने से सब चीजें सुधर जाएंगी, ये सोच गलत है, जबकि सत्ता शेयरिंग होनी चाहिए, क्योंकि जब एक औरत बदलेगी तो उसके साथ उसके बच्चे बदलेंगें, उसका परिवार बदलेगा, उसका समाज बदलेगा और ये राजनीति भी बदलेगी। लेकिन हमारे समाज में ये देखा गया है कि महिलाओं के साथ काम करने में पुरुष बहुत असुरक्षित हो जाता है और वो स्पर्धा करने लगता है। दूसरे समाज में महिलाओं और लड़कियों को खुला वातारण दिया जाता है, लेकिन हमारे समाज में वो सोच अभी पूरी तरह नहीं बन पाई है। यही कारण है कि वो पूरी तरह से मुखर नहीं हो पाती हैं।  


राजनीतिक स्तर पर भी दलित महिलाओं का प्रतिनिधित्व शून्य ही दिखता है
?
देखिए राजनीति तो समाज से ही शुरू होती, जब उन्हें सामाजिक आंदोलनों में ही बाहर नहीं आने दिया जाता तो वो राजनीति में कहां से आएंगी। मैं समझती हूं दलित आंदोलनों में महिलाओं की बहुत जरूरत है। जब वो समाज के लिए आगे आएंगी तभी राजनीति में भी वो दिशा देंगी। इसके लिए पढ़ी लिखी जागरुक महिलाओं को संगठित प्रयास करने की बहुत जरूरत है।  मैं लगातार इस और प्रयास कर रही हूं।  

आप लगातार साहित्य सृजन कर रही हैं, लेकिन आपको वो पहचान नहीं मिल पाई जो मिलनी चाहिए थी। इसके पीछे आपको क्या कारण दिखते हैं
?
दरअसल मुझे एक एक्टिविस्ट की पहचान तक ही सीमित कर दिया गया है, मुझ पर ये मुहर लगा दी गई है कि मैं लेखका नहीं हूं, सिर्फ सामाजिक कार्यकर्ता हूं। इसके पीछे और भी कई तरह की राजनीति काम करती हैं, कई लोग अपनी मार्केटिंग खुद कर लेते हैं और कुछ नहीं कर पाते हैं। यही कारण हैं कि जिन लोगों ने एक-एक किताब लिखी है, उन्हें बड़ा साहित्यकार घोषित कर दिया जाता है और कई लोग इसी तरह की राजनीति का शिकार हो जाते हैं।  



आपको क्या लगता है कि हिन्दी साहित्य के बीच दलित साहित्य अपनी अलग पहचान बना पाया है
?
हिन्दी साहित्य में दलित साहित्य ने एक अलग पहचान बनाई है, अब दलित साहित्य एक समानांतर साहित्य है, पिछले बीस सालों में हमने लड़-झगड़कर एक जगह बनाई है, लेकिन आज लोग दलित शब्द पर ही सवाल खड़े करने लगे हैं, कुछ लोग कहते हैं कि हम इसे दलित साहित्य नहीं कहेंगे, हम इसे अंबेडकरवादी साहित्य कहेंगे। जबकि दलित साहित्य का पर्याय ही है अंबेडकरवादी साहित्य।  

अक्सर देखा जाता रहा है कि दलित साहित्यकार कई गुटों में बंटे हुए हैं
, जिसके कारण नए युवा दलित साहित्यकारों के लिए कुछ काम नहीं हो पा रहा है?
दलित साहित्यकारों में दो धाराएं चल रही हैं, एक धारा है जो बाबा साहब अंबेडकर को तो मानती है, लेकिन बुद्ध धर्म को नहीं मानती है, जिनमें वो लोग खुलकर बुद्ध धर्म का विरोध करते हैं और साफ कहते हैं कि बाबा साहेब ने हमें बुद्धिस्ट क्यों बना दिया। लेकिन उनकी मजबूरी है कि वो बाबा साहेब का खुलकर विरोध नहीं कर सकते। लेकिन दूसरा धड़ा बाबा साहब को भी मानता है और बुद्ध धर्म को भी मानता है। लेकिन इन दोनों धड़ों में पुरुषवाद हावी है, लेकिन मुझे लगता है कि इन दोनों में जो मतभेद हैं वो पावर के लिए हैं, दोनों अपने-अपने को बड़ा मानते हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं कि जो इन दोनों गुटों से खुद को अलग रखते हैं।   



अलग-अलग गुटों में बंटे लोगों को या संगठनों को कैसे एकजुट किया जा सकता है
?
लोगों ने अपने अहम को महत्व दिया है, जबकि संगठन उनके लिए सैकेंडरी है, हर कोई अपने अलावा दूसरे को मानना नहीं चाहता, ऐसे में एक यही रास्ता दिखता है कि सब अपने-अपने संगठन चलाते रहें, लेकिन आपस में तालमेल बनाए रखें।  इसके लिए दिल बड़ा करना होगा, लोकतांत्रिक होना होगा, कम से कम साल में एक बार सब मिलकर एक कार्यक्रम करें। जिसका अच्छा असर पड़ेगा।   

दलित मीडिया के स्थापित ना हो पाने के क्या कारण दिखते हैं ?
हालांकि हमारे यहां मीडिया पर काम करने वाले बहुत प्रखर लोग हैं, लेकिन हम लोग आपस में तालमेल नहीं रख पाते हैं। इसके अलावा संसाधनों का बहुत अभाव है। मीडिया के लिए अच्छे लोगों को आगे आना होगा। संसाधनों के अभाव को दूर करना होगा। एक जैसी सोच रखने वालों को एक साथ आना होगा। तभी दलित मीडिया स्थापित होगा।  

दलित उत्पीड़न के मामलों में लगातार इज़ाफ़ा हुआ है
, इसके क्या कारण मानती हैं ?
इसके लिए मैं दलित संगठनों को भी दोषी मानती हूं, जो बहुत कमजोर हो गए हैं, वो लोग संगठित हैं और हम लोग अभी तक संगठित नहीं हो पाए हैं, इसीलिए वो हमारे समाज के लोगों का उत्पीड़न करते हैं। ज्यादातर ने बीजेपी के साथ दोस्ती कर ली है, और आवाज़ नहीं उठा पा रहे हैं, जिसकी सरकार बनती है वो हावी रहते हैं, जब यूपी में बसपा की सरकार बनी तो ये मैसेज जाता था कि अब दलितों को कैसे पीटोगे। हमें अपनी उप जातियों को छोड़ना पड़ेगा और एक होना होगा, तभी समाज में एकता आएगी और उनका मुकाबला कर सकेंगे। 



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