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वक्त के साथ चलने की आदत ने दी मजबूत पहचान- राजीव कैन

साक्षात्कार की इस कड़ी में हम आपको रू-ब-रू करवा रहे हैं बिजनेस की दुनिया के एक ऐसे शख़्स से जिनकी फितरत ही है समय के साथ खुद को बदलना और तकनीक के साथ कदम ताल करना।  जी हां उस शख़्स का नाम है राजीव कैन। दिल्ली में जन्मे युवा उद्योगपति राजीव कैन फिलहाल नोएडा मे रहते हैं और ‘पिनाकी एलइडी एंड सोलर’ कंपनी का सफल संचालन कर रहे हैं। पेश हैं बातचीत के कुछ ख़ास अंश।


बिजनेस की तरफ आपका रुझान कैसे बढ़ा, कड़ी प्रतिस्पर्धा के दौर में आपने बिजनेस लाइन को क्यों चुना ? 
देखिए मैं एक बेहद गरीब परिवार से संबंध रखता हूं। 9वीं कक्षा में पढ़ते हुए ही मैंने काम करना शुरू कर दिया था। पिताजी की कमाई बहुत कम थी, ऐसे में उन्हें एक हेल्पिंग हेंड की जरूरत थी। घर में बड़ा होने के कारण ये जिम्मेदारी मुझ पर आ गई थी।   मैं पिताजी के साथ ऑटो पार्ट्स और रिपेयरिंग का काम करने लगा। ये काम मुझे मजबूरी में सीखना पड़ा था, लेकिन शुरुआत से ही इस काम में रूचि आने लगी थी। इसके साथ-साथ ही मैनें अपनी पढ़ाई भी पूरी की। 

आपने ऑटो रिपेयरिंग का काम करते हुए करोड़ों तक पहुंचने का सफर कैसे तय किया
 ?
मुझे बचपन से ही बड़े सपने देखने की आदत रही है, जब मैं ऑटो रिपेयर का काम करता था तो मैं अपने शोरूम का सपना दिल में संजोए हुए था। मैं शुरू से ही बहुत महत्वाकांक्षी रहा हूं। हालांकि बड़े सपने देखने की वजह से कई बार बड़े नुकसान भी हुए हैं। लेकिन कभी हिम्मत नहीं हारी।  पहले मैने ऑटो पार्ट्स का काम शुरू किया जो बहुत अच्छा चला, उसके बाद एक दोस्त के साथ पेंटिंग के ठेके लेने लगा, जिसमें काफी नुकसान हुआ। उसके बाद मैंने ठेकेदारी का शुरू किया और मेरा टर्नओवर करोड़ों तक पहुंच गया, लेकिन कुछ कारणों से मेरा ठेकेदारी का काम भी बंद हो गया। अभी मैं सोलर और एलइडी लाइट्स का काम कर रहा हूं।

अभी आपके क्या सपने बाकी हैं, जिन्हें आप पूरा करने की हसरत रखते हैं ?
मैंने अगले पांच साल में अपने इस बिजनेस का टर्नओवर 20 करोड़ करने का लक्ष्य रखा है। इसके साथ ही मैं जगुआर गाड़ी खरीदना चाहता हूं। 


आपकी कंपनी में कार्यरत कर्मचारियों से हमारी बातचीत हो रही थी
, जो आपकी काफी तारीफ कर रहे थे, आप इतने अच्छे रिश्ते अपने कर्मचारियों से कैसे निभा पाते हैं ?
देखिए मैं थोड़ा संवेदनशील इंसान हूं, और ये संवेदनशीनता मेरी उस समय जागी जब मैं ठेकेदारी का काम करता था। मेरे पास जो मजदूर काम करते थे, वो हमेशा ब्याज के चक्रव्यूह में फंसी रहते थे। जब मुझे ये बात पता चली कि ये लोग 10-10 पर्सेंट पर पैसा ब्याज पर लेते हैं और साहूकार इनका खून चूस रहा है, तो मैने उनके पैसे साहूकार को लौटाए और उनसे कहा कि जब भी तुम्हें पैसों की जरूरत हो तो मुझसे पैसे मांगना, लेकिन ब्याज पर कभी नहीं लेना। उसका नतीजा ये हुआ कि वो ब्याज की दल-दल से बाहर आ गए और मेरे साथ पहले से ज्यादा अच्छे तरीके से काम करने लगे। आज मुझे ठेकेदारी का काम बंद किए हुए 7 साल से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन उन लोगों के फोन आज तक मेरे पास आते हैं कि बाबूजी आप जब भी काम शुरू करोगे तो हमें जरूर अपने पास बुलाना। मेरे ऑफिस के कर्मचारी हों या लेबर मेरा व्यवहार सबसे ऐसा ही रहता है। 


आपने कभी बिजनेस के दौरान दलित होने का दंश झेला है
 ?
एक नहीं कई बार झेला है, जब यूपी में बीएसपी की सरकार चली गई और उसके बाद जो सरकार आई उसमें मुझसे ये तक कहा गया कि बीएसपी की सरकार में तुमने बहुत मौज ली है अब तुमको काम नहीं लेने देंगे। उस समय मेरी फर्म का टर्नओवर करीब एक करोड़ था। अगर मैं गलत तरीके से सरकार का फायदा लेता तो मेरा टर्नओवर 50 करोड़ हो गया होता। लेकिन मैंने ईमानदारी के साथ काम किया, लेकिन अनुसूचित जाति का होने की वजह से मुझे टारगेट किया गया और मुझे काम मिलना बंद हो गया। एक बार तो मैंने किसी काम के लिए नोएडा अथॉरिटी में लेटर दिया तो ठेकेदारों ने वहां के अधिकारी से कहा कि ये अछूत अशुद्ध लेटर है, इसे गंगाजल डालकर शुद्ध कर लीजिए। इसके अलावा और भी बहुत सारी घटनाएं हैं, लेकिन एक और बताने लायक घटना है, जो मैं आपको जरूर बताना चाहूंगा। एक बार मैंने ओबीसी बैंक में एससी कैटेगरी से लोन के लिए आवेदन किया।  ब्रांच मैनेजर ने मेरी फाइल हेड ऑफिस फॉरवर्ड कर दी। वहां पर जो अधिकारी मेरी फाइल देख रहा था उसने मेरी फाइल नीचे दबा दी और वो मुझे रोजाना कभी सुबह, कभी शाम को बुलाता था।  उसने कई हफ्तों तक मुझसे चक्कर लगवाए। एक दिन जब मैं वहां गया तो वो अधिकारी ऑफिस नहीं आया था। उसके पड़ोस में बैठने वाले लड़के को शायद मुझ पर तरस आ गया और उसने बताया कि उन्होंने जानबूझकर आपकी फाइल को टेबल के नीचे वाले खाने में रखी हुई। उस लड़के ने वो फाइल मुझे निकाल कर दिखा दी। उसके अगले दिन जब मैं वहां दोबारा गया तो वो अधिकारी फिर से कहने लगा कि आपकी फाइल नहीं मिल रही है मैं ढुंढवाता हूं। तभी मैने वो फाइल निकाल कर उन्हें दे दी। उसके बाद बैंक अधिकारी ने  मेरी फाइल में कई कमियां निकाल दी और मेरा लोन पास नहीं होने दिया।

आप डिक्की से भी जुड़े हुए हैं
, डिक्की के काम से आप कितने संतुष्ट हैं ?
मुझे लगता है कि डिक्की स्थापित हो चुके लोगों का स्थापित प्लेटफॉर्म है, सही कहूं तो वो उन लोगों का प्लेटफॉर्म हैं जो पहले ही सरताज हैं। डिक्की को छोटे और जरूरतमंद लोगों की सहायता करनी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है।


केंद्र सरकार ने एससी/एसटी के लिए जो योजनाएं निकाली
, जिनमें स्टार्ट-अप, स्टैंड-अप आदि हैं, उनका लाभ किस हद तक जरूरी वर्ग के लोगों तक पहुंच पा रहा है ?
ये सब योजनाएं नाम के लिए निकाली गई हैं, बल्कि मुझे तो लगता है कि ये योजनाएं दलित उद्योगपतियों को पहचान करने के लिए निकाली गई हैं। जिनके जरिए उन्हें फेल करने की कोशिशें की जा रही है। मैं आपको बताता हूं एससी/एसटी वेंचर कैपिटल फंड से पूरे देश में 50 दलितों को भी लोन नहीं मिला होगा। जिन्हें मिला है वो भी वही हैं जिनमें 51 प्रतिशत दलित और 49 प्रतिशत किसी अपर कास्ट वाले की हिस्सेदारी है।  उन कंपनियों में 51 फीसदी वाला दलित साइलेंट है। यानि सिर्फ नाममात्र के लिए पार्टनरशिप है।


मौजूदा दौर युवाओं के लिए सबसे खराब साबित हो रहा है
, उनमें भी यदि युवा दलित है तो उसके लिए परिस्थितियां और भयावह हो जाती हैं, ऐसे दलित युवाओं के लिए आप किस तरह चिंतित हैं, उनके लिए क्या कहना चाहेंगे ?
मुझे लगता है कि हमारे युवाओं को नौकरी का मोह छोड़ देना चाहिए। बिजनेस की तरफ आना चाहिए। मुझे लगता है कि हमारे युवाओं में विजन और मिशन की कमी है, अगर विजन और मिशन आ जाए तो हमारे युवा भी किसी से कम नहीं है। इसे आगे बढ़ाने के लिए शहर के लोगों को गांवों में जाना पड़ेगा और गांव के लोगों को शहर में आना पड़ेगा। उसके बाद जो बदलाव आएगा वो बहुत ही सुखद और संतुष्टि देने वाला होगा। 


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