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दलित उद्यमियों को एकजुट कर रहा है ‘डिक्की’- एन के चंदन

कहते हैं ‘जहां चाह, वहां राह’ अगर व्यक्ति सच्चे मन से कुछ करने की ठान ले तो उसके लिए रास्ते भी अपने आप बनते चले जाते हैं। जी हां बिजनेसमैन बनने की चाह और कड़ी मेहनत के बल पर एक ऐसी ही सफल राह बनाई है दलित उद्योगपति नंद किशोर चंदन (एन के चंदन) ने। यूपी में मुरादाबाद जिले के ज्योतिबाफुलेनगर में जन्मे एन के चंदन ने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया है और वो प्लास्टिक मॉल्डिंग के क्षेत्र में एक्सपर्ट माने जाते हैं। दलित चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (डिक्की) दिल्ली एनसीआर के अध्यक्ष एन के चंदन ने कभी दिल्ली में 800 रुपये के मासिक वेतन से नौकरी का सफर शुरू किया था, जो अब करोड़ों के टर्न ओवर वाली कंपनी ‘चंदन एंड चंदन इंडस्ट्रीज’ के एमडी हैं। पिछले दिनों ‘पड़ताल’ की टीम ने उनसे कई पहलुओं और अनुभवों पर ख़ास बातचीत की थी, जिसके कुछ ख़ास अंश पेश हैं । 
 
  
आपकी पारिवारिक पृष्टभूमि क्या रही है, आपकी शिक्षा-दीक्षा कैसी रही, आपने कहां से और कहां तक पढ़ाई की है ?
मैं मुरादाबाद जिले के ज्योतिबा फूले नगर का रहने वाला हूं। 8वीं तक की शिक्षा वहीं से ली। उसके बाद अपने पिता के साथ दिल्ली आ गया और 9वीं कक्षा में दाखिला लिया, जिसमें 2 बार फेल भी हुआ और तीसरी बार में 10वीं कक्षा में पहुंचा। 10वीं  कक्षा के दौरान शिक्षक पी के वोहरा जी और एस सी गुप्ता जी ने मेरी बहुत मदद की थी। उन्होंने मुझे फ्री ट्यूशन पढ़ाया। जिससे मेरा शिक्षा के प्रति गहरा लगाव हो गया और गणित की ओलंपियाड प्रतियोगिता में मुझे तीसरा स्थान मिला। फिर 11वीं कक्षा पास करने के बाद मैंने पॉलिटेक्निक में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग ट्रेड में दाखिला लिया, जहां पहला साल तो ठीक तरीके से बीता, लेकिन फिर शरारत के कारण दूसरे और तीसरे साल क्लास से सस्पेंड रहा। जिसकी वजह से 3 साल का डिप्लोमा 5 साल में पूरा हो पाया।   

बिजनेस की तरफ आपका रुझान कैसे बढ़ा
 ?
बिजनेस की तरफ रुझान बढ़ने की कहानी बहुत लंबी है। सन 1992 में जब मेरी पहली नौकरी लगी तो मैंने वहां पर बहुत मेहनत से काम किया था। लेकिन जब दिवाली आई तो उन्होंने मुझे बोनस के नाम पर मिठाई का डिब्बा पकड़ा दिया। जब मैं अपने दोस्तों से मिला, जो दूसरी कंपनियों में नौकरी कर रहे थे तो सभी अपने-अपने दिवाली बोनस के बारे में बता रहे थे। तो मुझे महसूस हुआ कि जिस कंपनी के लिए मैंने इतने दिनों तक दिन-रात एक करके मेहनत की, उसने मुझे सिर्फ मिठाई के डिब्बे के लायक ही समझा। उसके बाद मैंने वहां से नौकरी छोड़ने का मन बना लिया और दिल्ली के दरियागंज में अपने  दोस्त की कंपनी में नौकरी मांगने गया, जिनका फोटो कॉपियर पार्ट्स का बिजनेस था। लेकिन वहां नौकरी की की जगह खाली नहीं थी, फिर भी मैं वहां जाता रहा। तो उन्हें लगा कि ये लड़का सच में कुछ करना चाहता है। उन्होंने मुझसे कहा कि हमारे यहां सबसे कम वेतन 800 रुपये चपरासी को दिया जाता है। फिलहाल हमारे पास कोई जगह खाली नहीं है, अगर आपको नौकरी करनी है तो क्या इस वेतन पर करोगे। मैंने तुरंत हां कर दिया। उसके बाद उस कंपनी के मालिक ने मुझसे कहा कि इतने कम वेतन में कैसे काम करोगे। मैंने तभी उनसे कहा कि अगर मेरे अंदर क्षमता है तो मैं 1 साल में उतना वेतन  ले लूंगा जितना मुझे चाहिए। वरना 1 साल बाद में कंपनी छोड़ दूंगा। वहां मैंने खूब मेहनत से काम किया। जिसका परिणाम बेहद अच्छा रहा। पूरी कंपनी में मैं अकेला था जिसकी हर महीने वेतन बढ़ता था। और ठीक 1 साल बाद मेरा वेतन सभी लड़कों से ज्यादा था, जो मेरी पोस्ट पर काम कर रहे थे। उनका वेतन 3 हजार रुपये था और मेरा 3600 रुपए हो गया था। उसी कंपनी में 8 साल बाद मेरा वेतन कंपनी के एमडी से भी ज्यादा हो गया था। तब उन्होंने मुझे उसी कंपनी में पार्टनरशिप ऑफर की, जिसे मैंने स्वीकार कर लिया। लेकिन 2008 में इंडिया में ई वेस्ट का कॉन्सेप्ट आने के बाद हमारी कंपनी बंद हो गई। कुछ दिन मैं प्रोपर्टी के कारोबार से भी जुड़ा रहा और फिर मैंने चंदन एंड चंदन इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की शुरुआत की, जिसकी यूनिट गाज़ियाबाद के ट्रोनिका सिटी में स्थापित है।     


टाटा
 कंपनी के साथ आप कैसे जुड़े ?
सन 2013 में टाटा ग्रुप को इंडिया में एक दलित बिजनेसमैन चाहिए था, जो उनके साथ पाटनरशिप में काम कर सके। टाटा ग्रुप से मेरा एक करार हुआ, जिसमें हर महीने 20 हजार हेलमेट मुझे टाटा को बनाकर देने थे। लेकिन मैं वो ऑर्डर पूरा नहीं कर सका। फिर भी टाटा ग्रुप ने मेरी बहुत मदद की। उसके बाद टाटा पावर दिल्ली ने मुझे बुलाया औक मीटर बॉक्स बनाने का ऑर्डर दिया। उसके बाद से टाटा ग्रुप के साथ मेरा बहुत अच्छा बिजनेस चल रहा है। अब मैं बीएसईएस के साथ भी बिजनेस कर रहा हूं।  

दलित समाज से होने के चलते यहां तक पहुंचने के लिए आपको किन-किन परेशानियों का सामना करना पड़ा
 ?
देखिए सबसे पहले तो मैं आपको बताना चाहूंगा कि जब हमारी पहली कंपनी बंद हुई, जिसमें मेरी 25% की हिस्सेदारी थी।  मेरे पार्टनर ये फैक्ट्री बेचने लगे। जिसे मैं खरीदना चाहता था, लेकिन क्योंकि मैं दलित समाज से था तो वे मुझे ये फैक्ट्री नहीं बेचना चाहते थे। लेकिन वे फंसे हुए थे, इसलिए उन्हें ये फैक्ट्री मुझे ही बेचनी पड़ी। लेकिन यहां मैं ये भी बताना चाहूंगा कि मैं अपने कुछ अपर कास्ट के दोस्तों की वजह से ही ये फैक्ट्री खरीदने की हिम्मत कर पाया था।  

आप दलित उद्योगपतियों के संगठन
‘डिक्की’ से जुड़े हुए हैं। आपका संगठन दलित समाज के युवाओं को बिजनेस करने के लिए किस तरह से सहायता करता है ?
भारत सरकार की 2-3 योजना हैं। वेंचर कैपिटल फंड के तहत एफसीआई 5 करोड़ रुपये तक का लोन देता है। पिछले 5-6 साल से डिक्की भी इससे जुड़ा हुआ है। एससी/एसटी समुदाय के लिए क्रेडिट कार्ड योजना भी है, जिसमें गारंटी की जरूरत नहीं है। किसी भी बैंक से अगर कोई लोन लेता है, तो उसकी गारंटी एफसीआई देता है। इस तरह की योजनाएं डिक्की की वजह से ही शुरू हुईं हैं।  

जो लोग बहुत निचले स्तर पर कम पूंजी में अपना छोटा उद्योग चला रहे हैं, उन तक पहुंचने के लिए डिक्की क्या कर रहा है
 ? डिक्की के सभी सदस्य मिलकर पूरे देश में हर एक-दो महीने में एक कार्यक्रम करते हैं और हर तीन महीने में ‘वेंडर्स मीट’ करते हैं। हम उन लोगों को जोड़ने की कोशिश करते हैं जो डिक्की के सदस्य नहीं हैं।  

उद्योगपति होने के नाते आप सरकार से किस तरह की उम्मीद करते हैं
 ?
देखिए हमारे ज्यादातर उद्योगपति अपने दम पर अपना उद्योग चला रहे हैं, सरकार से या सरकारी योजनाओं से उन्हें बहुत कम या फिर कहें कि ना के बराबर सरकारी योजनाओं का फायदा मिल रहा है। इसलिए सरकार को भी चाहिए कि वो ज्यादा से ज्यादा जानकारी लोगों तक पहुंचाएं। इसके साथ ही लोगों को भी चाहिए कि वो सरकारी योजनाओं की जानकारी रखें और उनका लाभ उठाएं।  

समाज सेवा के क्षेत्र में आप किस तरह से योगदान देते हैं
 ?
मैं अपनी फैक्ट्री में नए साल के पहले रविवार को एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन करता हूं, जिसमें सिर्फ मेरी फैक्ट्री के ही नहीं बल्कि आसपास की फैक्ट्री के लोग भी आते हैं। उसमें उन्हें हुनर दिखाने का पूरा मौका मिलता है। पुरस्कार भी दिए जाते हैं। इसके अलावा मैं अपनी कंपनी में 14 अप्रैल और 6 दिसंबर की छुट्टी रखता हूं। हम कोशिश कर रहे हैं कि 5 करोड़ का टर्न ओवर वाली कंपनी हर साल 2 नए युवा को जोड़े और उन्हें 5 लाख रुपये महीने का काम मुहैया कराए। जिसमें कम से कम 10 फीसदी का मुनाफा उन्हें दिया जाएगा। इससे हम नए युवाओं को व्यापार की तरफ लाने की कोशिश कर रहे हैं और उन्हें सपोर्ट देने का प्रयास भी कर रहे हैं।  

जैसा कि आपने महसूस भी किया होगा कि समाज में भेदभाव बहुत है और इसका सबसे ज्यादा शिकार दलित युवाओं को ही होना पड़ता है, ऐसे में आप अपनी कंपनी में नौकरी पर रखते हुए दलित युवाओं के लिए क्या नजरिया रखते हैं
 ?
देखिए नियुक्ति करते समय मैं योग्यता को ध्यान में रखता हूं। मैं ये नहीं देखता कि कौन किस जाति से है, मुझे जिसमें योग्यता दिखती है, उसे ही मौका देता हूं। हां लेकिन इतना जरूर है कि आपको बातचीत में ही पता चल जाता है कि सामने वाला कौन है कैसा है। अगर अपने समाज के युवाओं में मुझे 60-65 फीसदी भी वो योग्यता दिखती है, जिसकी मैं उम्मीद करता हूं तो अपने आदमी को ही मौका देने की कोशिश करता हूं।  


अपने समाज के लोगों से आपको किस तरह का सहयोग मिलता है
 ?
देखिए मेरा 80 फीसदी काम अपर कास्ट के लोगों के साथ ही है और मेरी उनसे बहुत अच्छा तालमेल है।  मैंने कभी ऐसा महसूस नहीं किया कि मेरा उनसे कभी कोई मतभेद हो और मुझे उनका पूरा सहयोग मिलता है। लेकिन अपने समाज के अधिकारियों से वो सहयोग नहीं मिल पाता है। इससे थोड़ी निराशा जरूर होती है। देखिए अच्छे और बुरे लोग हर जाति में होते हैं। बहुत सारे अपर कास्ट के दोस्त ऐसे हैं, जो मेरे साथ अंबेडकर जयंती मनाते हैं। संसद भवन पर हमारा जो स्टॉल लगता है, वो वहां बैठते ही नहीं है, बल्कि सहयोग भी करते हैं।  

राजनीति और मीडिया को लेकर डिक्की क्या सोच रखता है
 ?
देखिए राजनीति से डिक्की का कुछ लेना-देना नहीं है और काम करने का दायरा भी अलग है। इसलिए वो किसी खास राजनीतिक पार्टी की तरफ झुकाव नहीं रखता है। रही बात मीडिया की तो ये हमेशा महसूस किया जाता रहा है कि अपने समाज का भी मीडिया खड़ा होना चाहिए, लेकिन डिक्की की तरफ से अभी तक ऐसी कोई पहल या सोच नहीं बन पाई है।  

भविष्य के लिए आपकी क्या योजनाएं हैं
 ? इस साल के लिए मेरा टारगेट अपने बिजनेस को चार गुना तक आगे ले जाने का है। फिलहाल मेरी कंपनी का का टर्नओवर 5 करोड़ का है, जिसे साल के अंत तक 20 करोड़ तक पहुंचाना है। और जगुआर गाड़ी खरीदना भी मेरा सपना है।  
सोशल मीडिया के बारे आप क्या सोच रखते हैं और न्यूज़ पोर्टल ‘पड़ताल.कॉम’ के बारे में आपका क्या कहना है ?
सोशल मीडिया एक बहुत बड़ी ताकत बनकर उभर रहा है ऐसे में दलित समाज की आवाज़ उठाने के लिए ‘पड़ताल.कॉम’ का स्वागत किया जाना चाहिए। ये बहुत ही सराहनीय और हिम्मत का काम है। अच्छा काम करने और भविष्य में अपनी जगह स्थापित करने के लिए मेरी तरफ से ‘पड़ताल’ की टीम को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।    


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1 Comments

  •  
    Akhilesh Chandaliya
    2018-02-25

    Hiiii, I want to know more about DEEKY. Akhilesh Bahujanmatrimonial.com Nangloi, New Delhi

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