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डॉ. भीमराव अंबेडकर जी का राष्ट्रवादी व्यक्तित्व

बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर जी की 127वीं जयंती पर विशेष...

एक व्यक्ति विशेष दर्शन मात्र से उसमें दूसरों की विशिष्टता का बोध कराने वाली संज्ञा का नाम है। एक व्यक्ति दसूरों से कितना भिन्न है, दूसरों की अपेक्षा उसके भीतर और बाहर क्या विशेषता झलकती है ?, यही विशेषता उस व्यक्ति का ‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व’ प्रकट करती है। उस एक व्यक्ति में अनेकों गुण समाहित होते हैं।  

 

भारतीय संविधान के निर्माता परम पूज्य बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर जी की गिनती ऐसी ही व्यक्तियों में की जाती है। बाबा साहब ने ज्ञान-अर्जन के लिए संघर्ष, अस्मिता के लिए संघर्ष, सदियों से पद्दलित, शोषित और अवमानित हिन्दू समाज में शुद्र कहलाने वाले वर्ग की पहचान की और उनके उत्थान के लिए संघर्ष करने की योजनाओं को गंभीरता से लेते हुए उच्च शिक्षा प्राप्त करने का संकल्प लिया और उसे साकार करने के लिए वो पश्चिमी देशों के लिए प्रस्थान कर गए, जहां उन्होंने अपने लक्ष्य को केंद्रित करते हुए अथक प्रयास कर किया। साथ ही कठिन परिस्थितियों को भी सहन कर उच्च शिक्षा प्राप्त की। अत: पश्चिमी देशों के विकास का उनकी मानसिकता पर गहरा प्रभाव पड़ा। भारत लौटने पर डॉ. भीमराव अंबेडकर जी ने अपने लोगों का पश्चिमीकरण करने का मानस बनाया, क्योंकि वो ख़ुद गरीबी एवं अभावों में पले, परंतु अस्पृश्यों के दुखों को देखकर वो इस व्यवस्था के विरोध में संघर्ष करने के लिए खड़े हो गए। जिससे कि वे लोग वर्णवादी, जातिवादी, छूआछूत, अंधविश्वास, मृत रीति-रिवाजों और संस्थाओं के शिकंजे से अपने आपको मुक्त कर सकें।  

 

बाबा साहब भारतीयता के सच्चे उत्तराधिकारी तो थे ही, परंतु उनके पास आधुनिक और वैज्ञानिक दृष्टि भी थी, जो उन्हें सभी कट्टरपंथियों से अलग करती थी। वो अर्थशास्त्री, कानूनविद एवं सामाजिक विज्ञानी होने के साथ-साथ भारत के दलित वर्ग के दुख-दर्द को उजागर करने के लिए एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में उभरे। बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अस्पृश्यता से लड़ने के लिए सन्  1924 में बंबई में ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ संस्था का गठन किया।  



डॉ. अंबेडकर जी ने ब्रिटिश सरकार मांग की थी वह ऐसे कानून बनाये जो इन वर्गों की अयोग्यताओं एवं कठिनाइयों को समाप्त कर सके। उन्होंने सन् 1930 में पुणे में दलित समाज को संबोधित करते हुए कहा था कि ‘किसी भी समाज का उदय तभी हो सकता है, जब उस समाज में पढ़े-लिखे लोग हों तो समाज का निर्माण स्वयं हो सकता है’  

बाबा साहब ऐसे राष्ट्रीय व्यक्ति थे जो दलितों के उत्थान और उनके अधिकारों को लेकर निरंतर संघर्ष करते रहे। उन्होंने हमेशा दलित समाज के लोगों को अपने अधिकारी के लिए संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया। उनके हृदय में दलितों के लिए अपार दर्द था, अपार सहानुभूति थी।  
 
दलितों को समुचित अधिकार दिलाने के लिए बाबा साहब समसामयिक राजनीति में सक्रिय होकर दलितों की सोई हुई आत्मा को जगाने के लिए भागीरथ प्रयत्न में लगे रहे। उन्होंने घोर उपेक्षित मानव समूहों में साहस एवं आत्म-निर्भरता का संचार किया और राजनीतिक चेतना पैदा की। उनका सत्त प्रयास था कि दलित वर्गों में अपने अस्तित्व, अपनी एकता, स्वतंत्रता और स्वाभिमान की भावना पैदा हो।



कुछ लोगों को ये भ्रम हो सकता है कि डॉक्टर बाबा साहब भीमराव अंबेडकर जी ने एक ही क्षेत्र में कार्य किया था, परंतु ऐसा नहीं है। वो इस देश के सच्चे भक्त थे। उनके कार्यों की प्रेरणा जातिहित तो थी, लेकिन राष्ट्रहित अधिक थी।

 बाबा साहब ने राष्ट्र के उत्थान और स्त्रियों को संवैधानिक क्षमता दिलाई। सभी देशवासियों के लिए उनकी दुर्दम्य आकांक्षा, उनके मन की पीड़ा, उनकी देशहित भावना, उनका आशीर्वाद तथा दूरदृष्टि समझनी हो तो उनका पूरा जीवन ही दर्शनीय और अनुकरणीय है। बाबा साहब के तीन मूल मंत्र थे- ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो’ ।  

इन सब बातों और विचारों से बाबा साहब का महान राष्ट्रवादी व्यक्तित्व प्रकट होता। भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर जी भारतवर्ष में अतीत से वर्तमान तक जन्मे अनेक महापुरुषों से भिन्न अद्वितीय विशिष्ट महापुरुष थे, यही उनका राष्ट्रवादी व्यक्तित्व है। समस्त भारतवासियों को को चाहिए कि बाबा साहब के संघर्षमयी जीवन को आदर्श मानकर उनके बताए मार्ग पर चलकर अपने समाज एवं राष्ट्र को सर्वोच्च स्थान पर ही खड़ा करके दम लें। बाबा साहब के प्रति यही हम सबकी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।     

मुख्य संवाददाता
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