img

असहमति हमेशा नकारात्मक नहीं होती

आज जब हम समाचार पत्रों अथवा इलेक्ट्रानिक मीडिया पर खबरें पढ़ते अथवा सुनते हैं तो विभिन्न प्रकार के संदर्भ पढ़ने और सुनने को मिलते हैं। कभी किसी खबर पर हम उछ्ल पड़ते हैं तो कभी किसी पर अपना माथा धुन लेते हैं। कारण केवल यह है कि आज का ‘मीडिया’ गोदी मीडिया बनकर रह गया है... पूरी तरह व्यावसायिक हो गया है। सच और फेक न्यूज से उसका कुछ लेना-देना नहीं रह गया है। ...आज मैं भी कुछ अलग-अलग मुद्दों पर बात कर रहा हूँ। कुछ संघ की, कुछ आरक्षण की, कुछ जाति-व्यवस्था की तो कुछ सरकार से असहमति की..... यह सब मैंने गोदी मीडिया के माध्यम से ही जाना है।    

पिछले दिनों यहाँ-वहाँ हुए चुनावों में भाजपा के नेताओं ने जाने कितने ही आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया, इनकी गिनती करना नामुमकिन ही नहीं, अपितु कष्टदायी भी है। राजनीतिक दलों द्वारा राजनीति में श्मशान, कब्रिस्तान, भगवा आतंकवाद जैसे शब्दों का प्रयोग नितांत ही समाज विरोधी कहे जा सकते हैं। इतना ही राजनीतिक विचारधारा में दकियानूसी सोच की ठुस्मठास भी कही जा सकती है।

संघ प्रमुख भागवत कहने को तो खुले तौर पर ये कहते हैं कि राजनीति लोक कल्याण के लिए चलनी चाहिए। लोक कल्याण का माध्यम सत्ता होती है। यदि राजनेता इस सोच के तहत काम करें तो श्मशान, कब्रिस्तान, भगवा आतंकवाद जैसी बातें होंगी ही नहीं। ये सारी बातें तब होती हैं, जब राजनीति केवल सत्ता भोग के लिए चलती है।... किंतु जब भागवत जी का गोदी राजनीतिक दल के राजनेता इस प्रकार के शब्दों का प्रयोग करके समाज में दीवार खींचने का यत्न करते हैं तो भागवत जी मौन रहने के अलावा और कुछ नहीं करते...क्यों? इस प्रकार क्या भागवत जी खुद अस्वस्थ्य राजनीती को पीछे से हवा नहीं दे रहे नहीं लगते?

आज जबकि देश के हर कौने में नाना प्रकार से अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति व अन्य पिछड़े वर्ग को सरकारी नौकरियों, शिक्षा में प्रदत्त संवैधानिक आरक्षण का सवर्णों के अनेकानेक संगठनों द्वारा विरोध किया जा रहा है, संघ् प्रमुख मोहन भागवत कहते हैं, ‘सामाजिक विषमता हटाने के लिए संविधान के तहत सभी प्रकार के आरक्षण को संघ का समर्थन है...और रहेगा। उनका कहना है कि आरक्षण नहीं, बल्कि आरक्षण की राजनीति समस्या है। ऐतिहासिक – सामाजिक कारणों से समाज का एक अंग पीछे है। बराबरी तब आएगी, जब जो लोग ऊपर हैं, वो झुकेंगे। समाज के सभी अंगों को बराबरी में लाने के लिए आरक्षण जरूरी है। हजार वर्ष से यह स्थिति है कि हमने समाज के एक अंग को विफल बना दिया है। जरूरी है कि जो ऊपर हैं वह नीचे झुकें और जो नीचे हैं वे एड़ियां उठाकर ऊपर हाथ से हाथ मिलाएं। इस तरह जो गड्ढे में गिरे हैं उन्हें ऊपर लाएंगे। समाज को आरक्षण पर इस मानसिकता से विचार करना चाहिए। सामाजिक कारणों से एक वर्ग को हमने निर्बल बना दिया। स्वस्थ समाज के लिए एक हजार साल तक झुकना कोई महंगा सौदा नहीं है। समाज की स्वस्थता का प्रश्न है, सबको साथ चलना चाहिए।’... 

भागवत जी के इस कथन को पढ़ने के बाद तो जैसे लगा कि संघ भारत का सबसे आदर्श संगठन है, किंतु संघ की कथनी और करनी में जमीन और आसमान का अंतर है। कहना अतिशयोक्ति न होगा कि आरक्षण के विरोध में जितने भी आन्दोलन हो रहे हैं अथवा किए जाए जा रहे हैं, सब के सब संघ और सत्ता द्वारा प्रायोजित ही लगते हैं।.. राजनीतिक लाभ लेने के लिए इन आन्दोलनों के पीछे विपक्षी दलों का हाथ भी हो सकता, इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता।

आरएसएस और विभिन्न मुद्दों पर उसकी सोच को लेकर कौतुहल का अंदाजा इससे ही लगाया जा सकता है कि तीन दिनों तक चले कार्यक्रम में भाजपा व संघ से जुड़े लोगों के साथ-साथ बड़ी संख्या में न सिर्फ पत्रकार, लेखक, कलाकार, अधिवक्ता, प्राध्यापक, छात्र व अन्य जुटे बल्कि सवालों की बारी आई तो 215 सवालों की बौछार भी की गई। उसे जोड़कर समूहों में भागवत ने जवाब भी दिए और आरोप लगाने वालों पर परोक्ष निशाना भी साधा। कभी गंभीरता से तो कभी हास्य विनोद के साथ उन्होंने यह स्थापित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि संघ किसी जाति, समुदाय, धर्म के पक्ष और विरोध में नहीं, राष्ट्र के लिए कार्यरत है। संघ लकीर का फकीर नहीं, बल्कि बदलते जमाने के साथ परंपरा और सभ्यता का ध्यान रखते हुए कदमताल करता संगठन है। राजनीति से संघ का कोई लेना देना नहीं है।..... संघ का यह बयान कितना ईमानदार और व्यावहारिक है? इस पर कैसे विश्वास किया जाए जबकि जमाने भर से स्पष्ट है कि पहले की जनसंघ और आज की भारतीय जनता पार्टी की पैत्रिक संस्था आरएसएस ही तो है। इस तीन दिन की संगोष्ठी में मोहन भागवत ने तमाम के तमाम सवालों के दोहरे अर्थ वाले जवाब दिए। किसी भी सवाल का सीधा उत्तर नहीं दिया।

एक सवाल आया कि अगर सभी धर्म समान ही हैं तो धर्म परिवर्तन का विरोध क्यों? क्या इसके लिए कोई कानून बनना चाहिए? इसके उत्तर में भागवत जी ने इतना ही कहा कि मैं भी सवाल ही पूछता हूं, अगर सभी धर्म समान हैं तो धर्म परिवर्तन क्यों?... यही भाजपा का भी रवैया है ...वह सवाल का उत्तर, सवाल के जरिए ही देती है। अपनी गलतियों पर पर्दा डालने के लिए दूसरी राजनीतिक पार्टियों की कमियां गिनाने पर उतर आती है।

जब भागवत जी से पूछा गया कि समाज में जाति व्यवस्था को संघ कैसे देखता है। संघ में अनुसूचित जाति और जनजातियों का क्या स्थान है? घुमंतू जातियों के कल्याण के लिए संघ ने क्या कोई पहल की है?  तो भागवत जी बड़े ही दार्शनिक अन्दाज में सवाल को लील गए और कहा, ‘आज व्यवस्था कहां है, अव्यवस्था है। कभी जाति व्यवस्था रही होगी, आज उसका विचार करने का कोई कारण नहीं है। जाति को जानने का प्रयास करेंगे तो वह पक्की होगी। हम सामाजिक विषमता में विश्वास नहीं करते।’  

एससी/एसी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर समाज में विभाजन की स्थिति है? इस पर प्रतिक्रिया और आक्रोश निर्मित हुआ है। क्या संसद को इसे बदलना चाहिए था? संघ इसे कैसे लेता है? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि कोई भी कानून गलत नहीं होता किंतु उसका अनुपालन ईमानदारी से होना चाहिए, उसका दुरुपयोग नहीं। ... प्रतिक्रियात्मक दृष्टि से तो यही लगता है कि सत्ता द्वारा अपने वकीलों के जरिए ही कोर्ट मे केस डालना और अपने ही वकीलों के द्वारा उस वाद के प्रतिवाद का केस डलवाना राजनीति का जैसे खेल हो गया है। और बाद में संसद के माध्यम से एससी/एसी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में अध्यादेश पारित कर देना, क्या राजनीतिक रोटियां सेकने का एक नापाक इरादा नहीं है? अध्यादेश पारित होने के बाद भी, क्या सुप्रीम कोर्ट नैनीताल हाईकोर्ट के निर्णय को मान्यता प्रदान करेगा...अभी यह प्रश्न निरुत्तर है।

चलते-चलते .... भीमा-कोरेगांव हिंसा के मामले में पाँच (5) सामाजिक एक्टिविस्टों की गिरफ्तारी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (19.09.2018) को कहा कि किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता का महज अनुमान के आधार पर गला नहीं घोंटा जा सकता। हमारे संस्थान इतने मजबूत होने चाहिए कि विरोध और असहमति को बर्दास्त कर पाएं।... मैं समझता हूँ कि यहाँ संस्थान का आशय केवल संस्थानों से ही नहीं, केन्द्रीय और राज्य सरकारों से भी है। हमें यह समझने की जरूरत है कि असहमति हमेशा नकारात्मक नहीं होती। ...सरकार को यह समझने की जरूरत है, अन्यथा....

लेखक:  तेजपाल सिंह तेज (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हैं- दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से आदि ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि, पुश्तैनी पीड़ा आदि (कविता संग्रह), रुन-झुन, खेल-खेल में आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), तीन निबन्ध संग्रह  और अन्य । तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक, आजीवक विजन के प्रधान संपादक तथा अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं।
                     


' पड़ताल ' से जुड़ने के लिए धन्यवाद अगर आपको यह रिपोर्ट पसंद आई हो तो कृपया इसे शेयर करें और सबस्क्राइब करें। हम एक गैर-लाभकारी संगठन हैं। हमारी पत्रकारिता को सरकार और कॉरपोरेट दबाव से मुक्त रखने के लिए आर्थिक मदद करें।

संबंधित खबरें

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked with *

0 Comments

मुख्य ख़बरें

मुख्य पड़ताल

विज्ञापन

संपादकीय

वीडियो

Subscribe Newsletter

फेसबुक पर हमसे से जुड़े