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इतिहास लेखन की भेंट चढ़े दलित स्वतंत्रता सेनानी

जब देश की आजादी की बात छिड़ती है तो दलित उसमें कहीं नहीं दिखते, इतिहास से एक वर्ग के योगदान को पूरी तरह मिटा दिया गया। और जो लोग अंग्रेजों के तलवे चाटते रहे और राय साहब की उपाधियों से सुसज्जित होते रहे उन्हें देशभक्तों की श्रेणी में ला दिया गया। जबकी उनके ऊपर ना जाने कितने क्रांतिकारियों के खून का कर्ज चढ़ा है। खैर इसमें कोई हैरानी की बात भी नहीं होनी चाहिए, जो लोग दलितों की परछाईँ तक से नफरत करते हों आखिर वो दलितों का गुणगान कैसे कर सकते थे। बल्कि इसके उलट वे हमेशा से खुद ही दलितों से ये सवाल करते रहे और जानबुझकर हीन भावना महसूस कराते रहे कि आख़िर दलितों का आजादी की लड़ाई में क्या योगदान था, हमेशा डॉ भीमराव अंबेडकर का नाम लेकर ये बताने की कोशिश करते रहे कि वो तो आजादी की लड़ाई में बाधक बन रहे थे और अंग्रेजों के पिठ्ठु थे, इसीलिए उनका पहनावा भी अंग्रेजों के जैसा था और वे हमेशा गांधी के विरोध में रहते थे। आजादी की कभी बात नहीं करते थे, सिर्फ दलितों की बात करते थे। दरअसल ऐसी सोच रखने वाला सिर्फ और सिर्फ दया का पात्र हो सकता है, क्योंकि वो मानसिक रुप से गुलाम हो चुका है मनुवाद का और इसलिए वो हर चीज को उसी चश्में से देखने का आदि हो चुका है। अगर ऐसा व्यक्ति ईमानदारी से बाबा साहब को जानना चाहेगा तो उसे महसूस होगा कि बाबा साहब कितने बड़े देशभक्त थे, बाबा साहब संकीर्ण मानसिकता के नहीं थे वे किसी एक समुदाय या वर्ग के लिए नहीं सोचते थे वे दूरदर्शी थे और देश के लिए सबसे पहले सोचते थे। हिंदु कोड बिल, श्रम कानून को सामने रखकर हम सहज ही सोच सकते हैं कि बाबा साहब में देशभक्ति की भावना कितनी गहरी थी, नेहरू के प्रचंड दबाव के बावजूद उन्होंने देशहित में सोचा और धारा 370 का विरोध किया। आइए हम एक नज़र डालते हैं देश के ऐसे क्रांतिकारियों पर जो दोहरी मानसिकता रखने इतिहास लेखकों की भेंट चढ़ गए, जिसके चलते उन्हें वो जगह नहीं मिल पाई जो मिलनी चाहिए थी। कम से कम हम उन्हें याद करके उन्हें एक श्रद्धांजली तो दे ही सकते हैं,  और उनकी वीरगाथाओं को आने वाली नस्लों तक पहुंचाने की कोशिश कर सकते हैं।
सबसे पहले बात करते हैं उदैया चमार की जो छतारी के नवाब के वफादार और प्रिय योद्धा थे, जिन्होंने 1804 में अंग्रेजों की गलत नीतियों से खफा होकर सैकड़ों अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया था। उनकी वीरता के चर्चे आज भी अलीगढ़ के आस -पास के क्षेत्रो में कहे सुने जा सकते हैं। आखिर 1807 में अंग्रेजो ने उन्हें पकड़ लिया और फांसी दे दी, लेकिन निडर ऊदैया ने अकेले ही अंग्रेजों से लोहा ले लिया था। जौनपुर जिले कुवरपुर गांव के बांके चमार  भी अकेले ही अंग्रेजों से लोहा लेने निकल पड़े थे लेकिन उनकी बहादुरी देखकर बहुत सारे लोग उनसे प्रभावित हुए और उनके साथ जुड़ गए और अंग्रेजों से जंग का ऐलान कर दिया। लगातार अंग्रेजों के खिलाफ गतिविधियों के कारण उन पर 50 हजार रुपये का का इनाम रखा गया था। 50 हज़ार रुपए उस ज़माने में काफी बड़ी रकम होती थी। अब आप इस रकम से ही अंदाजा लगा सकते हैं कि अंग्रेजों के दिलों में बांके का कितना खौफ रहा होगा। उनके 18 साथियो के साथ उन्हें फ़ांसी पर लटका दिया गया था। गंगा दीन मेहतर गंगू बाबा के नाम से जाने जाते थे। कानपुर के लोग आज भी उन्हें सम्मान के साथ याद करते हैं और उनकी वीरता के किस्से सुनाते हैं। वह भंगी जाति के थे और उस दौरान वह पहलवानी करते थे। वह 1857 में अंग्रेज़ों के विरुद्ध सतीचौरा के करीब वीरता से लड़े। कई अंग्रेज़ों को मौत के घाट उतारने के बाद आखिर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और फांसी पर चढ़ा दिया गया। जब 1857 की क्रांति बात होती है तो सबसे पहला नाम मंगल पांडेय का आता है लेकिन ये बताने की ज़हमत कोई इतिहासकार नहीं उठाता कि मंगल पांडेय को अंग्रेजो से बगावत करने की प्रेरणा किसने दी, मंगल पांडेय तो तन्मयता से अंग्रेजों की नौकरी कर रहे थे और शायद करते रहते अगर मातादीन वाल्मीकि उनका परियच देशभक्ति से नहीं कराते। लेकिन मातादीन वाल्मीकि अछूत जाति से थे इसलिए उनका नाम तक बताना जरूरी नहीं समझा जाता। 1857 की क्रांति के बाद पूरे देश में देशभक्ति की लहर दौड़ गई और अंग्रेजों को देश से बाहर खदेड़ने के लिए पूरे देश से लोग एकजुट होने लगे थे। 10 जून, 1857 को अंग्रेज़ों की आर्मी का एक छोटा दस्ता लॉरेंस हेनरी की कमान में अवध से चिनहट और बाराबंकी जा रहा था। मक्का पासी  ने 200 पासियों को लेकर उनका रास्ता रोका और कई अंग्रेज़ों को मार गिराया, लेकिन लॉरेंस ने उन्हें मार दिया। इसके बावजूद पासी समुदाय के लोगों ने हार नहीं मानी और अवध के बड़े भू-भाग पर कब्ज़ा कर लिया। पासी समुदाय के कई लोगों ने वीरता पूर्वक अंग्रेजों से लोहा लिया। बाद में मायावती ने मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके नाम शहीदों में शामिल किया, जिनमें से कुछ नाम इस प्रकार हैं-  महाराजा बिजली पासी, महाराज लखन पासी, महाराजा सुहाल देव, महाराजा छेटा पासी, और महाराजा दाल देव पासी।  चेता राम जाटव की बहादुरी के चर्चे दूर-दूर तक फैले थे, ऐसा कहा जाता है कि एक दिन महाराजा पटियाला ने एक आदमी को देखा जो एक शेर को पीठ पर लादकर चला जा रहा था। पूछने पर पता चला कि उस आदमी ने बिना हथियार के शेर को मार गिराया है। राजा ने उसे अपनी फ़ौज में शामिल होने के लिए कहा। राजा के कहने पर वह फ़ौज में शामिल हो गया। उस व्यक्ति का नाम चेता राम जाटव था। अंग्रेजों द्वारा जनता को परेशान करता देख वह उनसे लड़ पड़े जिसके बाद अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और पेड़ से बांध कर गोली मार दी। बालू राम मेहतर ने भी अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया। अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ लिया और उनको 16 दलितों के साथ पेड़ से बांध कर फ़ांसी दे दी। बाबू मंगू राम जाति से चमार थे। उनका जन्म 1886 ग्राम मोगोवाल जिला होशियार पुर पंजाब में हुआ था। देश के लिये जीवन पर्यंत संघर्षरत रहे। बाद में देश आजाद होने के बाद वह राजनीति में आ गए और अपनी पार्टी ग़दर पार्टी के नाम से शुरू की। आजीवन वह समाज की भलाई के लिए काम करते रहे। इनके अलावा, जीडी तपसे, भोला पासवान, पन्ना लाल बरुपाल, सन्जिवय्या, रामचंद्र वीरप्पा, वीरा पासी, सिदरन के साथ ही कई और ऐसे दलित हैं,  जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में मुख्य भूमिका निभाई। इनके अलावा दलित महिला वीरांगनाएं कभी किसी से कम नहीं रहीं। शहीद उधम सिंह एक ऐसा नाम हैं जो सदियों में पैदा होता है, जलियावालां जघन्य कांड उनकी आंखों के सामने हुआ था, जिसके बाद उसका बदला लेना ही उन्होंने अपने जीवन का मकसद बना लिया था, सरदार उधम सिंह ने जलियांवाला बाग नरसंहार के समय पंजाब के गवर्नर रहे माइकल ओ डायर को उसी की सरजमीं पर गोलियों से भून डाला, और आत्मसर्मपण कर दिया। खास बात तो ये थी कि उन्होंने माइकल ओ डायर के अलावा किसी को निशाना नहीं बनाया, क्योंकि वहां पर महिलाएं और बच्चे भी थे। अंग्रेजों ने फांसी की सजा की सुनवाई के दौरान जब उधम सिंह से पूछा कि उन्होंने किसी और को गोली क्यों नहीं मारी, तो वीर उधम सिंह का जवाब था कि सच्चा हिंदुस्तानी कभी महिलाओं और बच्चों पर हथियार नहीं उठाते। ऐसे थे हमारे शहीद-ए-आजम सरदार उधम सिंह। उधम को बाद में शहीद-ए-आजम की वही उपाधि दी गई, जो सरदार भगत सिंह को शहादत के बाद मिली थी। वीरांगना झलकारी बाई साहसी महिला झांसी की रानी की सहयोगी थीं। वह चमार जाति की उपजाति कोरी जति से थी।  युद्ध कौशल में उन्हें महारत हासिल थी। उनके सहयोग से ही झांसी की रानी लक्ष्मी बाई प्रतापगढ या नेपाल जाने में सफ़ल हो सकीं थीं।  उनकी सूरत झांसी की रानी से इतनी मिलती थी कि अंग्रेज़ भी धोखा खा जाते थे, जिसका फायदा उठा कर वह अंग्रेजों को भ्रमित कर देती थीं। वीरांगना उदा देवी लखनऊ के उजेरियन गांव की रहने वाली थीं। उनके पति मक्का पासी थे, जो चिनहट बाराबंकी में अग्रेज़ों द्वारा मार दिए गए थे। पति की लाश पर रोते हुये उन्होंने प्रतिशोध की कसम खाई।  बाद में वह बेगम हजरत महल द्वारा बनाई गई आर्मी की कमांडर बन गईं। उन्होंने 35 अंग्रेजों को मार गिराया था, लेकिन में बाद में वह मार दी गईं। दरअसल गर्मी में पीपल के पेड़ के नीचे जब अंग्रेज आराम कर रहे थे तब उन्होंने कई अंग्रेजों को मार गिराया। जनरल डावसन को संदेह हुआ तो वह मुआयना करने लगा। उसने देखा अंग्रेज सिपाहियों को गोली मारी गयी है। ऐसा लगा जैसे गोली ऊपर से मरी गई है। उसने अपने सहयोगी  वैलेक को बुलाया और दोनों ने पेड़ पर किसी साया को देखा। वैलेक ने फायर कर दिया और वीरांगना ’उदा देवी’ नीचे गिर पड़ी। गोली लगने से उनकी मृत्यु हो चुकी थी लेकिन उन्होंने कई अंग्रेजों को मरने से पहले मार दिया था। महावीरी देवी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की थीं महावीरी देवी, जिन्होंने आजादी के लिए प्राण न्यौछावर कर दिया। उनके साहसी कारनामें यहां लोक गीतों में गाए जाते हैं-     


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2 Comments

  •  
    Hina
    2017-08-19

    Nice article even we all are not aware of this fact behind this politics not even mentioned anywhere in the history.

  •  
    ?????? ?????
    2017-08-19

    ??????????? ??? ???????? महाविद्यालय में प्रचार्य

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