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मध्य प्रदेश- एक सर्वे के अनुसार, 92 फीसदी दलित बच्चे स्कूलों में पानी नहीं पी सकते

भोपाल। आजादी के 69 साल बाद भी देश के दलित बच्चे भेदभाव का देश झेलने को मजबूर हैं। चाइल्ड राइट औब्ज़र्वेटरी एवं मप्र दलित अभियान संघ द्वारा किया गया हालिया सर्वे इस भयावह सच्चाई को बयां करता है। सर्वे के अनुसार 92 फीसदी दलित बच्चे स्कूल में खुद पानी लेकर नहीं पी सकते, क्योंकि उन्हें स्कूल के हैंडपंप और टंकी छूने की मनाही है। 57 फीसदी बच्चों का कहना है कि वे तभी पानी पी पाते हैं, जब गैरदलित बच्चे उन्हें ऊपर से पानी पिलाते हैं। 28 फीसदी बच्चों के माता-पिता का कहना था कि प्यास लगने पर उनके बच्चे घर आकर पानी पीते हैं, जबकि 15 फीसदी बच्चों को स्कूल में प्यासा रहना पड़ता है।

कक्षा में आगे नहीं बैठने दिया जाता
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सर्वे के अनुसार, 93 फीसदी बच्चों को कक्षा में आगे की लाइन में बैठने नहीं दिया जाता है। इसके अनुसार, 79 फीसदी बच्चे पीछे की लाइन में, जबकि 14 फीसदी बच्चे बीच की लाइन में बैठते हैं।

गैरदलित शिक्षकों का व्यव्हार ठीक नहीं :-
 
88 फीसदी बच्चों के अनुसार, उन्हें शिक्षकों के भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। 23 फीसदी बच्चों का कहना है कि गैरदलित की तुलना में शिक्षक उनसे ज्यादा सख्ती से पेश आते हैं। 42 फीसदी बच्चों ने कहा, शिक्षक उन्हें जातिसूचक नामों से पुकारते हैं। इसी प्रकार 44 फीसदी बच्चों ने कहा कि गैरदलित बच्चें भी उनके साथ भेदभाव करते हैं। 82 फीसदी बच्चों के अनुसार मध्यान्ह भोजन के लिए उन्हें अलग लाइन में बिठाया जाता है।

छुआछूत ने ले ली जान :-
 
हाल ही में दमोह जिले के खमरिया कलां गांव के स्कूल में पढ़ने वाले 8 साल के बच्चे की बावड़ी में गिरने से मौत हो गयी। बताया जाता है कि शिक्षक दलित बच्चों को स्कूल के हैंडपंप से पानी नहीं पीने देते थे। इस कारण से अभिषेक भाई और दोस्तों के साथ बावड़ी में पानी पीने गया था।

ऐसे हुआ सर्वे :-
संघ द्वारा प्रदेश के पांच प्रमुख क्षेत्र बघेलखण्ड, बुंदेलखंड, चम्बल, महाकौशल और निमाड़ के 10 जिलों के 30 गांवों के 412 दलित परिवारों का सर्वेक्षण किया गया। इस दौरान इन गांवों के दलित सरपंच, शिक्षक, अधिकारी और कर्मचारियों से बात की गयी।

सर्वे के निष्कर्ष :-
 सर्वे में शामिल सभी गांवों में दलितों के साथ छुआछूत का प्रचलन है। यानि कोई भी गांव जाति आधारित छुआछूत से मुक्त नहीं है। मप्र में कुल मिलकर 70 प्रकार की छुआछूत प्रचलित है। 80 फीसदी गांवों में दलितों के मंदिर में प्रवेश पर रोक है। गांवों में नाई दलितों की कटिंग नहीं बनाते। 50 फीसदी गांवों में दलित बच्चों के आधुनिक नाम रखने पर गैर दलित उनकी पिटाई कर देते हैं। बुंदेलखंड में सबसे ज्यादा 52 प्रकार की छुआछूत प्रचलित है। चम्बल में 49, निमाड़ में 41, बघेलखण्ड में 38 और महाकौशल में 17 प्रकार की छुआछूत प्रचलित है।

स्कूलों में होने वाले उपेक्षित व्यव्हार और भेदभाव के चलते कई प्रतिभाशाली दलित बच्चे बीच में ही पढाई छोड़ देते हैं। आंकड़े बताते हैं कि पढाई में होशियार होने के बाद भी दलित बच्चों को स्कूल में सबसे पीछे बैठने को मजबूर किया जाता है।
 
निर्मला बुच अध्यक्ष, चाइल्ड राइट औब्ज़र्वेटरी मप्र 

 साभार-भीम दस्तक  

मुख्य संवाददाता
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