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स्त्री दशा- सोच बदलेगी तो बदलेगा नजरिया

बीते सप्ताह महिला हिंसा के खिलाफ पखवाड़ा मनाया गया। विश्वभर मे महिलाओं के खिलाफ हिंसा को नकारने और महिलाओ को न्याय, समानता दिलाने के मकसद से ये पखवाड़ा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता है। हर देश मे महिलाओ के खिलाफ विभिन्न स्तर पर हिंसा की घटनाये देखने को मिलती है। हमारे देश में महिलाओं के साथ यौन हिंसा,  जातीय हिसा,  आर्थिक गुलामी,  सिविल राईट से वंचित, बेगारी, छुआ-छूत,  साम्प्रदायिकता,  कुपोषण,  असमान वेतन और गैर बराबरी का दर्जा किसी से छिपा नहीं है।

भारतीय समाज मे महिलाओ को दूसरे दर्जे का नागरिक माना जाता रहा है। भारतीय संस्कृति  विभिन्न धर्मो की जकड़नबंदी  के शिकंजे मे कसी हुई है, जिसकी सबसे सबसे ज्यादा शिकार महिलाएं ही होती रही हैं। त्यौहारों  के नाम पर पुरूष महिमामंडन के अतिरेक  मे स्त्रियों को पूजा पाठ,  उपवास, पानी मे खडे हो कर सूर्य पूजा करने से लेकर होली के अवसर पर होलिका दहन मे महिलाओं को आगे करके उल्लास मनाया जाता है और महिलायें अपनी धार्मिक भावनाओं के साथ ये भी भूल जाती  हैं कि वे खुद एक औरत हैं।

शादी मे एक बडी परम्परा  है कि कन्या दान की जाए ?  क्या कन्या इन्सान  नही ?  कन्या दान,  दहेज, तिलक, गरीब से गरीब और अमीर पूँजीपति सब इसलिये करते  हैं कि उन्हे  सवर्ग  मिले।  सम्पत्ति मे लडकी के अधिकार को नकार कर उसे खुद से अलग कर दिया जाता है। परम्पराओं के नाम पर छोटा-मोटा गिफ्ट या कैश देकर  अपना बड़प्पन भी दर्शाया जाता है। पढ़ाई लिखाई बीच मे रोक कर शादी करके अपने फर्ज से पल्ला झाड़ लिया जाता हैं।

बिहार-झारखंड की यात्रा के दौरान मैने महसूस किया कि आज भी यहां का समाज सामन्ती युग मे जी रहा है। मैने रेल यात्रा के दौरान देखा कि महिला डिब्बे मे पुरुष भरे पड़े हैं।  न केवल भरे पड़े हैं बल्कि महिलाओ के लिये कोई जगह ही नही है। जवान लड़के सीट हथियाये बैठे रहते है, जबकि बुजुर्ग  महिलाएं खड़ी दिखती हैं,  बहुत सारी महिलाएं छोटे- छोटे बच्चों को गोद मे लिए खड़ी दिखती हैं लेकिन सीट पर बैठे मुस्टंडों की आंखों में महिलाओं के प्रति कोई दया भाव या सम्मान नहीं दिखता। महिलाये, छात्राएँ,  कामकाजी मजदूर महिलाऐं घंटों खड़े होकर, भिच-भिच कर सफर करती  हैं। जरनल डिब्बा  हो या महिला डिब्बा सब जगह एक जैसा माहौल है, लेकिन महिलाऐं इस नाइंसाफ़ी के खिलाफ कुछ नही बोलतीं। शायद अपने अंदर हिम्मत नहीं जुटा पाती हैं, मर्दवादी संस्कृति के खिलाफ कुछ बोलने की।

महिलाओं का असमान वेतन, न्यूनतम मजदूरी भी न मिलना, आस-पास के गांव देहातों मे गन्दगी के ढेर, मर्दानगी भरा माहौल, घर-बाहर का काम, शराब पीकर औरतों को पीटने के कृत्य किसी को भी  हैरान नही करते। ऐसे समय मे जब हिंसा के खिलाफ अभियानों मे महिलाओं के दुखों की दास्तानें खुल कर सामने आती हैं। महिलाओ को 50 प्रतिशत स्थानीय निकायों में जगह दी गयी है, परन्तु  उनके हिस्से के अधिकारों का उपयोग पति व बेटे करते है। इन महिलाओ को प्रशिक्षण भी नही दिया जाता। सरकारी योजनाओं तक की जानकारी नही होती ऐसे मे अपने अधिकारो का इसतेमाल कैसे कर  सकेंगी।

महिलाओं पर हिंसा न हो इसके लिए ज़रूरी है पुरूषो को  संवेदनशील बनाया जाये और महिलाओं की शिक्षा अनिवार्य हो , उन्हे स्वावलंबी बनाये बिना उनकी शादी न हो। और समाज में ऐसी शिक्षा और प्रचार-प्रसार किया जाए कि महिलाओं को सम्मानित दृष्टि से देखने का माहौल बन सके। उनके व्यवहार में महिलाओं के प्रति सम्मान की आदत उतारने की जरूरत है। तभी शायद सही मायने में महिलाओं के प्रति माहौल बदल सके। 


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