img

बाबा साहब का 'विराट संकल्प'

आज से 101 साल पहले 23 सितंबर 1917 का दिन असमानता और जातीय भेदभाव के खिलाफ लड़ाई के इतिहास में बहुत अहमियत रखता है। यह दिन हमें संकल्प और दृढ़ निश्चय की ताकत बताता है। सौ साल पहले आज ही के दिन 26 साल की उम्र में बाबा साहब भीमराव अंबडेकर ने आंखों में आंसू लिए एक संकल्प लिया था कि मैं इस देश से छुआछूत को खत्म कर दूंगा और समानता के लिए कार्य करूंगा, अगर ऐसा करने में नाकाम रहा तो मैं अपना जीवन खत्म कर लूंगा। 

बड़ौदा सियासत के महाराज सयाजीराव गायकवाड़ ने बाबा साहब भीमराव अंबेडकर को छात्रवृत्ति दी, और उच्च शिक्षा के लिए लंदन भेजा लेकिन उनके बीच ये करार हुआ कि पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें बड़ौदा सिसायत में 10 साल नौकरी करनी पड़ेगी। उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद बाबा साहब अपने वायदे के मुताबिक बडौदा पहुंच गए, वैसे तो जब सियासत का कोई बड़ा अधिकारी स्टेशन पहुंचता था तो उसका स्वागत करने के लिए दरबार के कई लोग उपस्थित रहते थे लेकिन अंबेडकर महार जाति के थे, इसलिए उनकी अगवानी करने के लिए कोई नहीं आया।


सबको ये खबर पता चल गई थी कि महाराज ने एक अछूत को सैनिक सचिव पद पर रखा है, हालांकि बड़ौदा महाराज चाहते थे कि बाबा साहब को अपनी सियासत का अर्थमंत्री बनाएं, लेकिन अन्य विभागों का प्रशासनिक अनुभव देने के लिए उन्होंने बाबा साहब को पहले सैनिक सचिव बनाना ठीक समझा। इतने ऊंचे पद पर आसीन अधिकारी को वहां के क्लर्क, मुंशी, यहां तक की चपरासी भी दूर से फाइल फैंक कर देता था। जब वे अपनी कुर्सी से उठकर जाते तो उनके उनके नीचे बिछी दरी को भी धोया जाता था। उन्हें पीने के लिए पानी तक नहीं दिया जाता था।

हालातों को समझते हुए बड़ौदा महाराज ने मंत्री को आदेश दे रखा था कि बाबा साहब के रहने की उचित व्यवस्था की जाये, लेकिन मंत्री ने उनकी किसी तरह की भी मदद नहीं की, और बाबा साहब के लिए उदासीन बना रहा, इस उपेक्षा और तिरस्कार के बाद अब खाने व रहने की व्यवस्था बाबा साहब को खुद ही करनी थी। बाबा साहब अपने भाई के साथ होटल या धर्मशाला में लिए भटकते रहे लेकिन जाति बताते ही कोई सीधे मुहं बात नहीं करता था। और बाहर निकाल देता था। आखिर में वे एक पारसी होटल में पारसी नाम एदल सरोबजी बता कर रहने लगे। मगर कुछ ही दिनों में बात चारों तरफ फैल गई और लोग हाथों में डंडे लिए बाबा साहब को मारने आ गए और उन पर आरोप लगाया कि उन्होंने हमारा धर्म और होटल भ्रष्ट कर दिया है, और उनको वहां से धक्के देकर निकाल दिया और सारा सामान सड़क पर फैंक दिया। 
 
उन्होंने पत्र लिखकर बड़ौदा नरेश को सूचित किया। महाराज ने अपने मंत्री से उनके रहने की व्यवस्था करने के लिए कहा, लेकिन मंत्री ने लाचारी जाहिर करते हुए कोई सहायता नहीं की। भूखे-प्यासे भटकते हुए बाबा साहब सयाजीबाग में वट वृक्ष की छांव में जा बैठे। लेकिन उनकी आंखों से गंगा-यमुना बहने लगी और वे फूट-फूटकर रोने लगे। कि हिन्दू समाज में अस्पृश्यों की कैसी दुर्गति है। इतना पढ़ा लिखा होने के बाद भी मेरी ऐसी दुर्दशा है तो मेरे समाज के जो लोग अभी भी अनपढ़ और गरीब हैं वो किस हाल में जी रहे होंगे। ये 23 सितंबर 1917 का ही दिन था जब उन्होंने खुद अपने आंसू पोंछे और संकल्प लिया, कि मैं अपना पूरा जीवन असामनता के खिलाफ लड़ने में लगा दूंगा। 

आज बाबा साहब के संकल्प की वजह से ही करोड़ों बहुजन एक सम्मानित जीवन जी रहे हैं। लेकिन क्या बहुजन समाज उनकी उम्मीदों पर खरा उतर पाया है ? क्या बाबा साहब का वो सपना वाकई पूरा हो चुका है जो उन्होंने बहुजन समाज के लिए देखा था ?  क्या बहुजन समाज की वो संख्या भी सम्मानित जीवन का हिस्सा बन चुकी है, जो बाबा साहब के सपने में थी ?  अगर नहीं, तो फिर उसका जिम्मेदार कौन है ? आज के दिन हम सबको ये संकल्प लेना होगा और बाबा साहब के प्रति वो ईमानदारी दिखानी  होगी, जिसकी उन्होंने उम्मीद की थी। उन्होंने कहा था कि अगर आप आगे बढ़ जाओ तो हाथ पकड़कर अपने पीछे वाले भाई को भी आगे बढ़ाना। आज के दिन हमें रुककर इन सब सवालों पर सोचना होगा, और जवाब ढूंढने होंगे, और उस बड़ी आबादी को साथ लाना होगा, जो हमारे निजी स्वार्थों के चलते पिछड़ गई है। यही हम लोगों की बाबा साहब के प्रति ईमानदारी होगी और सच्ची श्रद्धांजलि भी।... जय भीम  


' पड़ताल ' से जुड़ने के लिए धन्यवाद अगर आपको यह रिपोर्ट पसंद आई हो तो कृपया इसे शेयर करें और सबस्क्राइब करें। हम एक गैर-लाभकारी संगठन हैं। हमारी पत्रकारिता को सरकार और कॉरपोरेट दबाव से मुक्त रखने के लिए आर्थिक मदद करें।

संबंधित खबरें

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked with *

0 Comments

मुख्य ख़बरें

मुख्य पड़ताल

विज्ञापन

संपादकीय

वीडियो

Subscribe Newsletter

फेसबुक पर हमसे से जुड़े